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Tuesday, January 24, 2012

टोकरी बनाबाई में सिमटी क रही गेल अछि जिनगी

समय बदलल, व्यवस्था बदलल, बदलै के बहुत किछ बदली गेल मुदा नहीं बदलल त समाज के किछ एहेन वर्ग के स्थिति. हमरा आहाक समाज में एक टा एहने वर्ग अछि जकर जिनगी टोकरी बनाबाई में सिमटी क रही गेल अछि। प्रायः मिथिलांचल के सब गाम के अंतिम छोर पर पीढ़ी दर पीढ़ी इ सब झोपड़ी बना क कोनो तरहे अपन गुजर बसर करैत छैथ प्राय: सड़क के कात में बसई वाला अहि वर्ग के लोग के छोट-छोट झोपड़ी स हिनक दीनता साफ-साफ झलकैत अछि, अशिक्षा के घोर कमी अछि अखनो धरी हिनक बच्चा स्कूल नहीं देखलखिन अछि। हिनक स्थिति देखला स सहज अंदाज लगोल जा सकैत अछि विकास के बयार अखनी धरी हिनक झोपड़ी तक नहीं पहुचलैन अछि। मिथिलांचल के हर शुभ आ अशुभ कार्य के अलावा घरेलू उपयोग में आवै वाला छिट्टा, ढकिया, डगरा, कोनिया, टोकरी आदि बांस स बनल ब‌र्त्तन मुख्य रुप स अहि वर्ग द्वारा बनायल जायत अछि। अहि ब‌र्त्तन के निर्माण में जाही हिसाब स मेहनत आ लागत अछि आ जाही प्रकार स आमदनी होयत अछि ओही स आन जरुरत त दुरक गप्प पेटो भरनाई मुश्किल अछि। हिनक सबहक मुख्य व्यवसाय बांस के ब‌र्त्तन बनेनै आ सूअर पालन अछि, जे कि पुश्तैनी धंधा अछि। सरकार के तरफ स भले किछ दावा केल जाई मुदा हकीकत इ अछि जे सरकारी योजना सब स इ वर्ग कोसो दूर छैथ कुल मिला क अगर देखल जाई त अइयो इ वर्ग समाज के सबस पिछला पायदान पर अछि।

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