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Friday, October 18, 2013

कोजागरा पर सगरो छिड़आयत हँसी

 आसिन मासक पूनिम केर चान अपन मुस्की सगरो बाँटत। धरतीक कण-कणकेँ अपन इजोरियासँ स्नान करा जुड़ा देत। ओ अपन अमृत कलश छिलकेता। लोक मान्यताक अनुसार
आश्विन पूर्णिमाक राति चान अमृत बरसबै छथि। एमहर धरतीक चान फोँका मखान सेहो अपन हँसी छिड़िआयत। ओकरा संग दहीक मटकूर किंवा छाँछी आ बताशा ठहक्का लगायत। ई सभ होयत नव विवाहित वरक लेल मिथिलाक प्रसिद्ध पर्व कोजागरापर। ई पाबनि तँ होइ छनि ओहि नव विवाहित वरक लेल जिनक विवाहित जीवनमे कोजागरा पहिले-पहिल अबैत अछि, मुदा एहिमे समवेत होइत अछि सम्पूर्ण समाज जे पूनिम केर चान, मखान, दही आ बताशाक हँसीक फुहारसँ तितैत ओहिमे अपन उछाह घोरि दैत अछि आ धरतीपर उतरि अबैत अछि स्वर्गक आनन्द।
धर्म प्रधान भारत राष्ट्रे जकाँ मिथिलोमे ओना तँॅ प्रतिदिन कोनो ने कोनो अवसर रहिते अछि जकरा लोक आनन्द-उत्साह आ आस्था-विश्वासक संग मनबै छथि। मिथिलाक अपन विशिष्टता रहल अछि जे ई जन-जीवनक प्राय: सभ पक्षकेँ अपना दृष्टिसँ देखलक अछि आ तदनुकूल अपन स्वतंत्र चिन्तन सेहो रखलक अछि। गीत-संगीत, ज्योतिष सहित विभिन्न क्षेत्रमे एकर बेछप छवि चर्चित रहल अछि। आर तँ आर मिथिला पाबनि-तिहार पर्यन्तमे अपन स्वतंत्र उपस्थिति अंकित केलक। बहुत रास एहन पाबनि अछि जे मिथिलेमे मनायल जाइत अछि। एहिमे दू गोट एहन प्रमुख पाबनि अछि जे नव विवाहित दम्पती लेल होइत अछि जिनका विवाहित जीवनमे ई प्रथमे अबै छनि। पहिल अछि ‘मधुश्रावणी’ जे नव विवाहिता कनिञा लेल होइत अछि आ दोसर ‘कोजागरा’ जे नव विवाहित वर लेल होइत अछि। दुनू पाबनि वर-कनिञा अपना नैहरमे मनबै छथि। दुनू पाबनिमे सासुरसँ पूजन सामग्री आ चुमाओनक डाला सहित घर-घरायन लेल नव वस्त्र तथा मधुर आदिक भार अबैत अछि। मधुश्रावणी महिला लोकनिक बीच आ कोजागरा महिला-पुरुष नेना-भुटका सभक लेल।

सासुरक दूभि-धानसँ होयत चुमाओन

कोजागरामे वरक सासुरसँ चुमाओन लेल दूभि-धान आ मधुर आदिसँ सजल डाला अबै छनि। एहिपर मखान, मखानक माला, घुनेश, चानीक कौड़ी, नारियर, केरा, दहीक छाँछ, पान, गोटा सुपारी, लौङ, इलायची आदिक संग विभिन्न तरहक मधुर फराक-फराक राखल रहैत अछि। पहिने तँ एहिपर सुपारीक गाछ, जनौ केर गाछ आदि सेहो रहैत छल जे एहि मैथिल ललनाक हस्तकलाक प्रतिभाकेँ मुखर करैत छल। आब एहिमे कमी आबि गेल अछि। डालापर लोक अपन साधंस केर हिसाबे आन-आन वस्तु सेहो सजबै छथि। एहि डालाक निरीक्षण सर-समाज करैत अछि। जे डाला जते पैघ आ नीक जकाँ सजाओल तकर तते प्रशंसा। एही डालाक दूभि-धान लऽ वरक घरक महिला लोकनि चुमाओन करै छथि आ पुरहर-पातिलक दीपसँ गाल सेदै छथि। परिवार आ सामजक वरिष्ठ पुरुष लोकनि दूर्वाक्षत मंत्रक संग दीर्घ ओ सुखी जीवनक आशीर्वाद दै छथि।
चुमाओन ओहिना नञि भऽ जायत। एहि लेल आङनमे अष्टदल अरिपन देल जायत जाहिपर डाला राखल जायत। पुरहर-पातिल आ कलशक अरिपन सेहो देल जायत। ओहिपर तरमे धान दऽ आमक पल्लव युक्त कलश प्रतिष्ठित होयत। पातिलमे दीप जरैत रहत। मिथिलाक पाबनि बिनु गीतक कोना भऽ सकैत अछि? से मैथिल ललना सभक मधुर स्वर वातावरणमे घोरायत आ चुमाओनक विधि
पूरा होयत।  

सार महोदय बनता कनिञा

पत्नीक भ्राता अर्थात् ‘सार’ शब्द कानमे पड़िते ठोर विहुँसि पड़ैत अछि। आ जँ हुनका कनिञा बना वरक संग बैसेबाक बात हो तँ मुस्की बदलि जाइत अछि ठहाकामे। से कोजागराक राति नव विवाहित वरक आङन नाँघि मैथिलानीक समवेत हँसी-ठहाका सगरो वातावरणमे पसरैत रहैत अछि। कोजागरा पाबनिक समय धरि कनिञाक दुरागमन नञि भेल रहै छनि। विवाहक चारिमे दिन दुरागमन करेबाक परम्परा आरम्भ हेबाक बादो अधिकांश ठाम ई लगले नञि होइत अछि। से कनिञा रहै छथि अपना नैहरमे। जखन वरक चुमाओन होइ छनि तँ असकर कोना हेतनि, बहुत ठाम कनिञाक स्थानपर कलशकेँ मानि लेल जाइत अछि तँ बहुतो ठाम कनिञाक स्थानपर सार महोदयकेँ बैसाओल जाइ छनि। हँ ई देखल जाइत अछि जे सार कनिञासँ छोट होथि। हुनका संग चौल करैत तौनी ओढ़ा घोघ कऽ देल जाइ  छनि आ सामूहिक हँसी-मजाकसँ घर-आङनक पोर-पोर आनन्दक सागरमे उभचुभ करऽ लगैत अछि।

बँटायत पान मखान-बतासा

आङनमे चुमाओनक विधि आ लक्ष्मीक पूजनक बाद दलानपर हबगब तेज भऽ उठत। वरक सासुरसँ आयल मखान, पान आ बतासा समाजक बीच बाँटल जायत। बारिक एकाँएकी सभक बीच ई बँटता। एहिमे नेना-भुटकाक उछाह कने बेसी छिलकैत रहत। एक संग पचासो हाथ बारिक सोझाँ आयत आ ओ सभपर थोड़े मखान आ बतासा राखि देता। पानक बारिक पान राखि देता। एहि लेल साँझे गाम-टोलमे हकार देल जायत। लोक बेराबेरी ओहि सभ दलानपर पहुँचि पान-मखान-बतासा लेता जाहि ठाम कोजागरा मनायल जायत। रोम-रोम झकझक देखार केनिहार इजोरियामे बहुतो मखान-बतासा खायब आरम्भ करता जकर ‘कुरकुर-कुरकुर’ ध्वनि आ हकार पुरनिहारक पानसँ रङल ठोर-दाँत घरवैयाकेँ तृप्त करतनि। बहुतो ठाम-ठामसँ मखान-बतासा लऽ ओकर छोट-छोट पोटरी बनेता। एके बेर कते खेता? पोटरी बनेबाक क्रममे नेना-भुटका केर मखान-बतासा छिटेबो करत जे अगिला भोर धरि मुस्कियाइत ओहि दऽ गेनिहार बटोहीक स्वागत करत।
होयत लक्ष्मी पूजन आ रात्रि जागरणा
ओना तँ दीपावलीक   राति लक्ष्मी-गणेशक पूजा सगरो होइत अछि। मिथिलोमे दीयाबातीक राति लक्ष्मी-गणेश पूजल जाइ छथि, मुदा एहि ठाम कोजागराक राति लक्ष्मी पूजन प्रशस्त अछि। एहि लेल दुआरिसँ भगवती घर धरि अरिपन देल जायत। चिनुआरपर सेहो अरिपन होयत। ओहि ठाम जल भरल लोटामे आमक पल्लव राखल जायत आ भगवतीकेँ घर करबाक विधि परिवारक वरिष्ठ महिला करती। मान्यता अछि जे कोजागराक राति लक्ष्मी घरे-घर बुलै छथि आ देखै छथि जे के जागल अछि-
निशीथे वरदा लक्ष्मी: कोजागर्तीति भाषिणी।
तस्मै वित्तं प्रयच्छामि अक्षै: क्रीड़ां करोति य:।।
एहि मान्यताक अनुरूप बहुतो रास लोक राति भरि जागरण करै छथि। जिनका ओहि ठाम पाबनि रहै छनि हुनक समय तँ हकार पुरनिहार सभक मखान-बतासा-पानसँ स्वागतमे बीति जाइ छनि, आ जिनका ओहि ठाम पाबनि नञि छनि ओहो पचीसी आदि खेलैत जागरण करैत माता लक्ष्मीक स्वागतमे राति बितबै छथि।
देओर-भाउजक
बीच पचीसी
कोजागराक राति देओर-भाउजक बीच पचीसीक खेल चर्चित रहल अछि। एहि खेलमे देओर-भाउज राति
 बितबै छथि।
एहि बीच हुनक हास-परिहाससँ वातावरण सराबोर होइत रहैत अछि, मुदा आब ई अपवादे भेटैत अछि। कारण मिथिलाक गाम-घर आब अपना लोकक बिनु उदास रहैत अछि। भाउज कोनो महानगरमे अपन पति आ बाल-बच्चाक संग बिता रहल छथि तँ देओर कतहु आन ठाम रोजी-रोटी लेल अपस्याँत छथि। यैह कारण अछि जे पहिने कोजागराक राति जतऽ घर-घर देओर-भाउजक बीच पचीसीक खेल होइ छल से समटा कऽ ओहि घरमे रहि गेल अछि जाहिमे ई पाबनि मनायल जाइत अछि। सेहो विधि पुरौअलि मात्र।
कौमुदी महोत्सवोक आयोजन
नव विवाहित केर ओहि ठाम मनाओल जायवला कोजागरा केर अतिरिक्त एहि पाबनिकेँ विभिन्न संस्था आ संगठन कौमुदी महोत्सवक रूपमे सेहो
मनबैत अछि।
अनेको साहित्यिक संस्था एहि अवसरपर कवि-गोष्ठीक आयोजन करैत अछि तँ राष्टÑीय स्वयंसेवक संघ सेहो एहि महोत्सवपर सामूहिक पायस भोजनक ओरियान करैत अछि। कोजागराक राति चन्द्रमाक इजोरियाक संग अमृत बरसबाक मान्यताक अनुरूप खुजल अकासक नीचाँ मखानक खीर बनाओल जाइत अछि। ओकरा बिनु झाँपन देने राखल जाइत अछि आ सभ मिलि-बाँटि खाइ छथि। पाबनिक अवसरपर लोक सभ अपना घरोमे खीर बनबै छथि।
आउ मिथिलाक एहि प्रसिद्ध पाबनिमे हमरो लोकनि सम्मिलित होइ। लक्ष्मीसँ सम्पूर्ण मिथिलापर कृपा दृष्टिक आशीर्वाद माङी। चन्द्रमासँ मिथिलाक धरतीपर अमृत-कलश उझीलि एकर पोर-पोरकेँ रसमय बनेबाक अनुनय करी जाहिसँ लहलहा उठय सभ फसिल। चली नव विवाहितक दलानपर धरतीक चान फोँका मखानक संग बतासा आ पान पाबि ली।

साभार : अमलेन्दु शेखर पाठक के ई लेख मिथिला आवाज में प्रकाशित अछि 

Friday, September 27, 2013

हकन्न कानि रहल मिथिलाक ऐतिहासिक स्थल

विश्व पर्यटन दिवसपर विशेष - अमलेन्दु शेखर पाठक 

 इण्टरनेट युगमे पढ़ल-लिखल जानकार लोक समग्र मिथिलाक नहिञो तँ कमसँ कम अपना क्षेत्रक एहन स्थलक विस्तृत विवरण ओ चित्र विश्व भरिक इण्टरनेट उपयोग केनिहार धरि तँ पहुँचाए सकै छथि जे पर्यटनक केन्द्र बनि सकैछ। ई काज मिथिला-मैथिली सेवी-संगठन सेहो कऽ सकैत अछि। आउ विश्व पर्यटन दिवसपर संकल्प ली जे अपना क्षेत्रक ऐतिहासिक धरोहरिकेँ विश्वक मानचित्रपर स्थापित करबा लेल व्यवस्था धरि सेहो अपन बात पहुँचायब आ अपनो एहि दिशामे सधल आ ठोस सकारात्मक डेग उठायब। तखने एहि दिसवकेँ मिथिला लेल सार्थक मानल जा सकैत अछि। 


जगत जननी जानकीक आविर्भाव स्थली मिथिलाक पवित्र भूमिपर जते डेग चलब ततेक ऐतिहासिक, पुरातात्त्विक आ धार्मिक स्थल भेटि जायत। ई पढ़बा-सुनबामे भने अतिशयोक्ति लगैत हो, मुदा जखन मिथिला क्षेत्रमे चारू भरि नजरि खिरायब तँ ई सहज लागत। एहि ठाम धार्मिक किंवा आध्यात्मिक स्थलक बहुतायत भेटत, तेँ ऐतिहासिक आ पुरातत्त्व स्थल एहिसँ कनेको कम नहि भेटत। धार्मिको स्थलमे अधिकांश अपनामे इतिहास आ पुरातात्त्विक महत्वकेँ समेटने अछि। जेम्हरे टहलि जाउ कने कान पाथि दियौ आ कनेको अँखिगर-चँकिगर होइ तँ ओहि ठामक सिहकैत बसात इतिहास-गाथा सुनबैत भेटि जायत। से प्राचीन मिथिला, माने ओहि मिथिलामे सेहो ई गुण भेटत जाहिमे ई नेपालक मिथिलाक संग छल आ वर्त्तमान मिथिलामे सेहो। एहि सभकेँ पर्यटन केन्द्रक रूपमे विकसित कऽ देशक, राज्यक आ मिथिला क्षेत्रक आर्थिक स्थितिकेँ तँ सुदृढ़ कयले जा सकैत अछि। आर्थिक स्थिति सबल होयत तँ आनो-आन तरहक विकास सहजे होइत चलि जायत। एकरा संगहिँ एक बेर फेरसँ मिथिला अपन विशिष्ट परिचय मन पाड़ैत विश्वक शिरो-मुकुट बनि सकैत अछि। पर्यटनक दृष्टिसँ मिथिलाक सुप्रिष्ठा आरो बढ़ि सकैत अछि। एहि ठाम एहन स्थलक कमी नञि अछि जे पर्यटन केन्द्र केर रूपमे विकसीत भऽ सकय, मुदा दुर्भाग्य अछि जे ई सभ ऐतिहासिक स्थल सभ अपन उपेक्षासँ हकन्न कानि रहल अछि।
मिथिलामे एखनो देश-विदेशसँ लोक अबै छथि। अबै छथि एहि ठामक अक्षर-ब्रह्म उपासक लोकनिक कीर्त्ति केर अवलोकन करबा लेल। मिथिलाक विद्वद् परम्परा हुनका एहि ठाम अनै छनि। शोध केर क्रममे अनेको विदेशी छात्र आ शिक्षक कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय, ललितनारायण मिथिला विश्वविद्यालय आ संस्कृत शोध संस्थानक धनी पुस्तकालयसँ सहयोग लेबा लेल अबै छथि। ओतहि मिथिला चित्रकलाक अवलोकन किंवा ओहिपर कोनो विशेष काज करबाक होइ छनि तँ मधुबनीक गाममे ई सभ नजरि अबै छथि। एहि हिसाबे मिथिलाक एहि क्षेत्रकेँ शैक्षिक पर्यटन केन्द्रक रूपमे विकसित कयल जा सकैत अछि। ओतहि मिथिलाक सभ जिलाक ऐतिहासिक स्थल सभकेँ विकसित कयल जा सकैत अछि। एहिमे दरभंगा केर  रामायणकालीन महर्षि गौतमक स्थान, अहल्यास्थान, भैरव बलिया, नवादाक हैहट्ट देवी मन्दिर, मकरन्दा भण्डारिसौँ केर वाणेश्वरी भगवतीक संग हायाघाटक सिमरदह, दरभंगा शहरक मिर्जापुर स्थित भगवती म्लेच्छमर्दिनी, राज परिसरक माधवेश्वर परिसर स्थित तारा आ श्यामा मन्दिर सहित अन्य देवी मन्दिर, राज किलाक भीतर अवस्थित कंकाली मन्दिर, कुश द्वारा स्थापित कुशेश्वरस्थान महादेव मन्दिर, जिला मुख्यालयसँ सटले पञ्चोभ गामक डीह, कवीश्वर चन्दा झाक जन्मस्थली पिण्डारुछ, बहेड़ीक हावीडीह, भरवाड़ाक गोनू झाक गाम, कुशेश्वरस्थानक पक्षी विहार आदि एहन स्थल अछि जाहि ठामक कण-कणमे मिथिलाक इतिहास बाजि रहल अछि।   
एही तरहेँ मधुबनी जिलाक महाकवि विद्यापतिक जन्मस्थली बिस्फी, कालिदासकेँ ज्ञान देनिहार उच्चैठक छिन्नमस्तिका भगवती, शिवनगरक गाण्डीवेश्वरस्थान, कपिलेश्वरस्थान, मङरौनी, बलिराजगढ़, वाचस्पति मिश्रक जन्मस्थली आ कवीश्वरचन्दा झाक सासुर अन्धराठाढ़ी, विदेश्वरस्थान, महरैल गाम लग भेल कन्दर्पीघाटक लड़ाइ केर ऐतिहासिक स्थल, मधेपुरक वाणेश्वर महादेव मन्दिर, गिरिजास्थान फुलहर, भ्रदकालीस्थान कोइलख, राजराजेश्वरी डोकहर, भुवनेश्वरीस्थान डोकहर, सौराठ सभा, उग्रनाथ महादेव भवानीपुर, राजनगरक प्रसिद्ध किला आ भूतनाथ मन्दिर, विशौल जतऽ सीता स्यंवरक समय राजा जनक महर्षि विश्वामित्रक विश्राम करबाक व्यवस्था केने छला, ठाढ़ी गाम लगक मदनेश्वर महादेव, आ कमलादित्य स्थान (परमेश्वरी मन्दिर), जमुथरिक गौरी-शंकर मन्दिर, परसा, झञ्झारपुरक सूर्यधाम, सीरध्वज जनकक पूर्वद्वारपर विराजमान शिलानाथ जे आब शिलानाथ गाममे छथि, एही क्षेत्रक ददरी, जगवनक विभाण्डकाश्रम जाहि ठाम विभाण्डक मुनिक कुटी छलनि,  जयनगर लग श्रीकूपेश्वर, कलना गामक श्रीकल्याणेश्वर  पचहीक श्रीचामुण्डास्थान, महादेव मठ लग शुक्रेश्वरी भगवती, बाबू बरही प्रखण्डक सड़रा-छजनाक बीच पाँचम-छठम शताब्दीक अवतारी पुरुष सलहेसक डीह, सरिसवक अयाची मिश्रक डीह, सिद्धदेश्वरी स्थान, सूर्य मूर्ति सवास सहित दर्जनो आरो एहन स्थल अछि जे पर्यटन स्थलक रूपमे विकसित हेबाक अर्हता रखैत अछि। 
तहिना समस्तीपुर जिलाक ओइनी जे मिथिलाक राजधानी रहल अछि आ जाहि ठाम महाकवि विद्यापतिक समय बितलनि आ अपन अधिकांश रचना ओ एही ठाम केलनि, ओइनी पहिल हिन्दी तिलस्म उपन्यास लेखक देवकी नन्दन खत्रीक जन्म भूमि हेबाक संग स्वाधीनता समरमे अपनाके होमि देनिहार खुदीराम बोससँ सेहो जुड़ल रहल अछि। एकरा अतिरिक्त पूसाक शिवसिंह डीह, महाकवि विद्यापतिक निर्वाण भूमि वाजितपुर विद्यापति नगर, मोरवाक खुदनेश्वरस्थान, पाण्डव लोकनिक अज्ञातवासक स्थल रहल पाँड डीह, मंगलगढ़, पटोरीक बाबा केवल स्थानमे अमर सिंह केर पूजन लेल देश-विदेशसँ लोक अबै छथि, महान दार्शनिक उदयनाचार्यक गाम करियन, जागेश्वरस्थान विभूतिपुर, मालीनगर शिवमन्दिर, धोली महादेव मन्दिर खानपुर, धमौनक निरञ्जन स्वामीक मन्दिर आ सन्त दरिया साहेबक आश्रम, मन्नीपुर भगवती स्थान, रोसड़ा टीसनसँ किछु पूबमे अवस्थित विधिस्थान जतऽ चतुरानन ब्रह्मा विराजमान रहला, शहरक थानेश्वरस्थान, मुसरीघरारीक भगवती स्थान सहित अनेको मन्दिर आदि अछि जे इतिहास-गीत गाबि रहल अछि। एकरा सभकेँ एक-दोसरसँ जोड़ि पर्यटन   केन्द्रक रूपमे विकसित करब सम्भव अछि। 
राष्टकवि रामधारी सिंह दिनकरक जन्मस्थली रहल बेगूसराय जिलाक नौलागढ़, जयमंगलागढ़, वीरपुर-बरियारपुर, शिव मन्दिर (गढ़पुरा), सिमरियाघाट, मुजफ्फरपुर केर खुदीराम बोस स्मारक, गरीबनाथ मन्दिर, कोठियाक मजार, दाता कम्मल शाहक मजार, शिरुकहीशिरफी काँटी, पूर्णिञा केर भगवती पूरनदेवीक मन्दिर, सिकलीगढ़, किशनगञ्ज केर चर्चित खगरा मेला, लखीसराय  केर श्रृंगी ऋषिक आश्रम, अशोकधाम, जलप्पा स्थान, गोविन्द स्थान रामपुर, पोखरामा, सहरसा जिला केर उग्रतारा स्थान महिषी, लक्ष्मीनाथ गोसाइँक कुटी वनगाम, मण्डन-भारती स्थान, कन्दाहाक सूर्यमन्दिर, मत्स्यगन्धा मन्दिर, उदाहीक दुर्गा मन्दिर, नौहट्टाक शिव मन्दिर, देवनवन शिवमन्दिर, कात्यायनी मन्दिर, मधेपुरा केर कारू खिरहरि स्थान, सिंहेश्वरस्थान, रामनगर काली मन्दिर, दौपदीक वसन्तपुर किला, माता सीताक प्राकट्य स्थली सीतामढ़ी केर जानकी मन्दिर, पुनौराधाम, हलेश्वरस्थान, चामुण्डा स्थान, शिवहर जिलाक द्रौपदीक जन्मस्थली मानल जायवला देवकुलीधाम, वैशाली जिला अन्तर्गत महनारमे गंगातटपर स्थित गणिनाथ गोविन्दक स्थान, बसाढ़, कटिहार केर लक्ष्मीपुरक गुरु तेगबहादुरक ऐतिहासिक गुरुद्वारा, पक्षी अभयारण्य गोगाविल झील, कल्याणी झील, बेलबा, बल्दीबाड़ी, शान्तिवट ओला फसीया, नवाबगञ्ज, दुभी-सूभी, मनिहारी, बल्दीबाड़ी आदि चर्चित स्थल रहल अछि आ सभक अपन ऐतिहासिक आ धार्मिक महत्व अछि। 
एही तरहेँ चम्पारण केर बेतिया राज, सोमेश्वर महादेव मन्दिर, सीता कुण्ड, चण्डीस्थान, हुसैनी जलविहार, गान्धी स्मारक, वाल्मीकि आश्रम, व्याघ्र परियोजना, देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धामक संग त्रिकुट, नन्दन पहाड़, नौलखा मन्दिर, वासुकीनाथ मन्दिर, भागलपुर केर सुल्तानगञ्जमे गंगाक बीच अवस्थित बाबा अजगैबीनाथ, विक्रमशिलाक क्षेत्र, मन्दार पहाड़, कहलगामक ऋषि जाह्नुक स्थान, मनसा देवी मन्दिर, विषहरि स्थान, कुप्पाघाट, मुंगेरमे अवस्थित मीरकासिमक किला, माँ चण्डिाकस्थान कर्णक उन्टल कराह, पीरशाह मुफाक गुम्बज, शाह सूजा केर महल, लाबागढ़ीक ऋषि-कुण्ड आदिक कोण-कोणसँ इतिहास बजैत अछि।  
बहुत रास एहनो स्थल अछि जे एके नामसँ अनेक ठाम अवस्थित अछि। जेना देकुलीधाम, ई दरभंगा, समस्तीपुर आ शिवहर तीनू ठाम अछि आ तीनूकेँ ऐतिहासिक मानल जाइत अछि। एहिमे भैरवीस्थान केँ सेहो देखल जा सकैत अछि। ई  मन्दिर मिथिलामे दू ठाम अछि। पहिल मधुबनी जिलान्तर्गत कोठिया ग्रामसँ एक किमीपर अवस्थित अछि आ दोसर औराइ क्षेत्र सीतामढ़ी जिलामे अछि। तहिना महिषासुर मन्दिर अन्दामा, उमामहेश्वर महादेव मठ, लदहोक भगवान विष्णु केर मन्दिर, ज्योतिरीश्वरक जन्म स्थान पाली, विष्णु बरुआर सूर्य मन्दिर आदि अनेक ऐतिहासिक ओ पुरातात्त्विक स्थल मिथिलामे अछि। 
पोखरिक पेटमे इतिहास 
मिथिला क्षेत्रकेँ नदीक नैहर कहल जाइत अछि। एहि ठाम गंगा, कोसी, कमला, गण्डक, धेमुरा, त्रियुगा, बलान आदि सैकड़ो पैघ-छोट नदीक संग हजारोक संख्यामे विशाल पोखरि सभ सेहो अछि। एहि पोखरि सभमे सेहो इतिहास नुकायल अछि। ई समय-समयपर पुरातात्विक महत्वक मूर्त्ति आदि दैत रहल अछि। एखनो दैत अछि। ओतहि पोखरि खूनल जेबाक सेहो अपन इतिहास अछि। एकरा सभक इतिवृत्ति सेहो नव-नव तथ्यक जनतब दऽ सकैत अछि आ एहिमेसँ कतेको पर्यटक केर आकर्षणक केन्द्र बनि सकैत अछि। 
समवेत जनशक्तिक प्रयोजन 
ई सभ अछि बानगी भरि। एहन सैकड़ो अन्य महत्वपूर्ण स्थल अछि जे अचर्चित रहि गेल। एहि ठामक प्राय: मन्दिरमे पूज्य देवी-देवता कोनो ने कोनो समयमे कतहु खेत जोतैत काल तँ कतेको बेर माटि खुनैत काल किंवा पोखरिमे भेटला। कतेको ठाम पुरातात्विक महत्वक देवी-देवताक प्रस्तर-प्रतिमा कोनो मन्दिर परिसरक गाछ तर खुजल अकासक नीचा पड़ल छथि। मिथिला क्षेत्रमे जते डीह अछि सभक कोखिमे कोनो ने कोनो कालखण्डक इतिहास दबल पड़ल अछि। एकर सभक गहन अध्ययन, अनुसन्धान-अन्वेषणसँ इतिहासमे नव पन्ना के कहय नव अध्याय धरि जुटि सकैत अछि, मुदा एकरा उजागर के करत? ई यक्ष प्रश्न अछि। जखन धरतीपर विराजमान ऐतिहासिक स्थल सभकेँ स्वतंत्रताक 66 साल बादो पर्यटन केन्द्रक रूपमे विकसिति हेबा लेल मुँहतक्की अछि तखन धरतीक नीचाँ कुहरि रहल इतिहासक पीड़ाकेँ के कान-बात देत? एहि लेल चाही मिथिलाक समवेत जनशक्ति जे अपन जनप्रतिनिधिक माध्यमे व्यवस्थाकेँ बाध्य कऽ सकय जे पर्यटन केन्द्रक रूपमे जाहि कोनो स्थलमे सम्भावना अछि तकरा ओहि रूपमे विकसित कयल जाय। विश्वक पर्यटन-मानचित्रपर एहि सभ स्थलक आबि गेने जखन पर्यटक पहुँचता तँ ओ कतऽ रहता, की खेता, कोन ठामक वाहनपर यात्रा करता, निश्चित रूपसँ मिथिलाक आ ई क्षेत्रक पैघ आर्थिक आधार बनि सकत, मुदा ई मात्र सोचबा भरिसँ नञि होयत। एहि लेल दृढ़ संकल्पक प्रयोजन अछि। अन्यथा एहिना पर्यटन दिवस सभ साल अबैत रहत आ जाइत रहत। हमरा लोकनि बस पर्यटकीय दृष्टिसँ क्षेत्रक विकासक सपना टा गबैत रहि जायब। एकर गुण-गरिमाक कीर्त्तन टा करैत रहि जायब। 
हम अपनो डेग बढ़ाबी 
व्यवस्थाकेँ अपना क्षेत्रक ऐतिहासिक, पुरातात्त्विक ओ धार्मिक स्थलकेँ पर्यटन केन्द्रक रूपमे विकसित करबा लेल तँ अवश्ये कही, मुदा एहि लेल ओकरेपर ओठङने काज चलऽ वला नञि। एहि लेल अपनो डेग बढ़ेबाक प्रयोजन अछि। अपना क्षेत्रक महत्वपूर्ण स्थलक दर्शन लेल अपना ओहि ठाम एनिहार सर-कुटुम्बकेँ प्रेरित कऽ हम छोट सन सकारात्मक   प्रयास कऽ सकै छी। मन पड़ैत अछि असोमक गुवाहाटी केर बोकाखातक ओ कॉलेज जाहि ठाम साहित्य अकादेमी दिल्लीक संगोष्ठी आयोजित छल। ओहि ठाम लगभग दू सय छात्र-छात्रा बेराबेरी ई कहैत रहला जे ‘काजीरंगा’ अवश्य घूमि लेब। से ई नञि जे एक गोटे कहलनि तँ ओ सूनि रहल दोसर नञि कहता। एकाँएकी सभ कहलनि। आ अन्तत: शान्त पड़ल उत्कण्ठा तेना जागल जे ‘काजीरंगा’ देखने बिनु नञि रहि सकल रही। हमरा लोकनिकेँ स्वयं सेहो एहि ठामक सभ महत्वपूर्ण स्थलक पर्यटन तँ करी। जाहिसँ एहि सभक जानकारी आबऽ वला पीढ़ीक बीच बाँटि सकी। हमरा लोकनिकेँ सेहो स्वभाव विकसित करऽ पड़त। एकरा संग आजुक इण्टरनेट युगमे पढ़ल-लिखल जानकार लोक समग्र मिथिलाक नहिञो तँ कमसँ कम अपना क्षेत्रक एहन स्थलक विस्तृत विवरण ओ चित्र विश्व भरिक इण्टरनेट उपयोग केनिहार धरि तँ पहुँचाए सकै छथि जे पर्यटनक केन्द्र बनि सकैछ। ई काज मिथिला-मैथिली सेवी-संगठन सेहो कऽ सकैत अछि। 
आउ विश्व पर्यटन दिवसपर संकल्प ली जे अपना क्षेत्रक ऐतिहासिक धरोहरिकेँ विश्वक मानचित्रपर स्थापित करबा लेल व्यवस्था धरि सेहो अपन बात पहुँचायब आ अपनो एहि दिशामे सधल आ ठोस सकारात्मक डेग उठायब। तखने एहि दिसवकेँ मिथिला लेल सार्थक मानल जा सकैत अछि। 
आउ एक नजरि नेपालक ओहि मिथिलो दिस दी जे पर्यटनक दृष्टिसँ सजग अछि आ हमरा सभसँ बहुत आगाँ अछि।
एहिमे नेपालक जनकपुर स्थित माँ जानकी मन्दिर प्रमुख अछि जतऽ प्रतिवर्ष हजारो पर्यटक पहुँचै छथि। एहि ठाम धनुषा, खिरोइ नदी लग स्थित योगनिद्रास्थान, सखरा गाम स्थित कालिकास्थान श्रीजलेश्वर, श्रीक्षीरेश्वर, कुसुमा गामक याज्ञवल्क्याश्रम, श्री मिथिलेश्वर, हरिहरस्थान, वाल्मीक्याश्रम, कौशिकाश्रम, कामेश्वरनाथ महादेव मन्दिर आदि चर्चित स्थल रहल अछि। 

 साभार : मिथिला आवाज मैथिली दैनिक समाचार पत्र के 27 सितम्बर के अंक में प्रकाशित 

Wednesday, September 18, 2013

सुख-समृद्धि दै छथि भगवान अनन्त

अनन्तरूपेण विभर्षि पृथ्वीमनन्त लक्ष्मीं विद्धासि तुष्ट:।
अनन्त भोगान्  प्रददासि  तुष्टोह्यनन्तमोक्षं पुरुषे प्रहृष्ट:।।
अनन्तरूप धारण कऽ पृथ्वीक चराचर जीवक भरण-पोषण केनिहार, प्रसन्न हेबापर अनन्त लक्ष्मीकेँ प्रदान कऽ अनन्त सुख, ऐश्वर्य, भोगकेँ प्रदान केनिहार आ अन्तमे मोक्ष देनिहार अनन्त स्वरूप भगवान श्री अनन्तक पूजा अनन्त कालसँ होइत आबि रहल अछि। भविष्योत्तर पुराणमे कहले गेल अछि-
संसारसागरगुहासु सुखं विहर्तुं, वाज्छन्ति ये कुरुकुलोद्भव शुद्धसत्वा:।
संपूज्य  च  त्रिभुवनेशमनन्तदेवं, वद्धन्ति  दक्षिण  करे वरडोरकन्ते।।
अर्थात् एहि संसार-सागरमे जे सुख-समृद्धिपूर्वक रहऽ चाहै छथि से चौदह ग्रन्थि (गेँठ)सँ युक्त अनन्तक डोरकेँ बन्है छथि। भाद्र शुक्ल चतुर्दशीकेँ ई पूजन होइत अछि। ई चतुर्दशी उदयव्यापिनी अवश्य हो। पक्षधर मिश्र ‘तिथिचन्द्रिका’मे कहै छथि-
अनन्तस्य व्रते राजन् घटिकैका चतुर्दशी ।
उदये घटिकार्द्धं वा सैव ग्राह्या महाफला।।
अर्थात् जाहि दिन उदयकालसँ एक घण्टा वा आधो घण्टा धरि चतुर्दशी हो, ताही दिन पूजा करी।
एहि पूजामे प्रात: स्नानादि नित्यकृत्यसँ निवृत्त भऽ, सर्वतोभद्र बना ताहिपर कलश-स्थापन कऽ कुशक अनन्त भगवानक प्रतिमा बना राखल जाइत अछि। पिठारसँ अष्टदल अरिपन लीखि अनन्तक पूजन होइत अछि। एहिमे 14 प्रकारक पकमान, 14 प्रकारक फल, फूल ओ नाना प्रकारक नैवेद्यक डाली लऽ टोल भरिक स्त्रीगण वा गाम भरिक स्त्रीगण एकट्ठा होइ छथि आ डालीकेँ एकठाम सजा कऽ राखल जाइत अछि। तदन्तर पूजा होइत अछि। पूजा समात्पिक उपरान्त पुरान डोरकेँ फोलि ताहि संग नवीन 14 गेँठ युक्त अनन्तकेँ गायक दूधसँ भरल बासनमे मथल जाइत अछि।
मथबा काल विधि अछि जे एक व्यक्ति पुछै छथि- की मथै छी?
पूजा केनिहार उत्तर दै छथि- समुद्र।
पुन: प्रश्न होइत अछि- की तकै छी?
पूजा केनिहार उत्तर दै छथि- अनन्त।
पुन: प्रश्न होइत अछि- भेटला?
उत्तर- भेटला। ई कहैत पूजा केनिहार अनन्तक डोरकेँ दूधसँ बहार कऽ माथमे स्पर्श करै छथि। पूजनक उपरान्त पुरुष दहिना हाथमे आ स्त्रीगण वामा हाथमे अनन्तक डोर बन्है छथि। एहि पूजाक संकल्प 14 वर्ष धरिक होइत अछि। किछु लोक जीवन पर्यन्त करै छथि।
अनन्त पूजाक कथा भविष पुराणमे कहल गेल अछि- पाण्डव जखन अत्यन्त दु:खी भेल वनमे उद्विग्न भऽ गेला तँ युधिष्ठिर कृष्ण भगवानकेँ पुछलथिन- हे भगवन! कोनो एहन उपाय कहल जाय जे करबासँ मनुष्यकेँ मनोवाञ्छित फलक प्राप्ति हो। ताहिपर श्रीकृष्ण कहलथिन- पृथ्वीपर स्त्री-पुरुषकेँ कयल सभ पापक मुक्ति अनन्त व्रतसँ होइत अछि। अनन्त डोर बन्हबाक मंत्र अछि-
अनन्त संसार महासमुद्रे, मग्नान् समभ्युद्धर वासुदेव।
अनन्तरूपे विनियोजयस्व, अनन्तरूपाय नमो नमस्ते।।
युधिष्ठिर द्वारा ई जिज्ञासा करबापर जे कहिया आ के पहिल-पहिल अनन्तक पूजन केलनि आ एकर की पुण्य आ फल भेल, पुन: श्रीकृष्ण कहलथिन- सतयुगमे सुमन्तु नामक एक ब्राह्मण ‘दीक्षा’ नामक भृगुपत्नीसँ विवाह केलनि। दीक्षाकेँ शीला नामक कन्या भेलनि। किछु दिनक उपरान्त समन्तुक पत्नी दीक्षाक देहान्त भऽ गेलनि। सुमन्तु पुन: धर्मपुत्रक बेटी ‘कर्कशा’ सँ विवाह केलनि। पुत्री शीला माता-पिताक सेवा करैत रहली। शीलाकेँ युवावस्थामे प्रवेश करैत देखि सुमन्तु कौटिल्य नामक ब्राह्मणसँ विवाह करा देलथिन। विवाहक उपरान्त सुमन्तु अपन पत्नी कर्कशाकेँ कहलथिन जे जमायकेँ किछु धन दान दऽ बिदा करू, मुदा कर्कशा जेहने नाम तेहने गुण। क्रोधेँ लहलह करैत घरमे जे कैञ्चा-कौड़ी छलनि से पेटीमे लऽ कऽ नैहर पड़ा गेली। सुमन्तु सातुक बटखर्चा बान्हि बेटी-जमायकेँ बिदा केलनि। कौटिल्य अपन पत्नीक संग यात्रा केलनि। बाटमे भूख लगलनि तँ दुनू प्राणी एकटा पोखरिक कातमे जलपान करबाक हेतु गेला। ओतऽ शीलाक नजरि पड़लनि, बहुत रास स्त्रीगण सभ एकठ्ठा भऽ लाल-पीयर नूआ पहिरि भगवानक पूजा कऽ रहल छली। जिज्ञासावश शीला हुनका लोकनिकेँ पुछथिन जे ई केहन व्रत थिकै? सभ स्त्रीगण शीलाकेँ कहलथिन जे ई अनन्तक पूजा थिक। एहि व्रतमे बिना अन्न-जल ग्रहण केने नाना प्रकारक पकमान, फल, फूल, नैवेद्य आदिसँ पीताम्बर विष्णुक पूजन होइ छनि। हुनका आगूमे लाल-पीयर 14 गेँठ वला डोर राखल जाइत अछि। पूजाक उपरान्त ई अनन्तक डोर स्त्री वाम हाथमे आ पुरुष दहिनामे बन्है छथि जाहिसँ जीवनमे सतत् सुख-समृद्धि होइत अछि। एहि तरहेँ 14 वर्ष धरि जे ई पूजन करै छथि हुनकर सभ कामनाक पूर्त्ति होइ छनि। ई सुनि शीला स्त्रीगण सभक संग व्रतमे रहि यथाविधि पूजा केलनि आ अनन्तक डोर बन्हलनि। पुन: संगमे राखल जे बटखर्चा छलनि ताहिमेसँ आधा ब्राह्मणकेँ दान दऽ कऽ घर आबि गेली। अनन्त व्रतक प्रभावसँ किछुए दिनमे धन-धान्य आ अपार सम्पत्तिक स्वामिनी बनि गेली। हुनक पति कौटिल्य एक दिन पत्नीक बाँहिमे डोर बान्हल देखि धन मदान्ध भेल कहलथिन- ई की बन्हने छी? ई कहैत अनन्तक डोर तोड़ि कऽ आगिमे फेकि देलथिन। एहिसँ अनन्त भगवान कुपित भऽ गेला। हुनक कोपसँ अनायास चोर-डकैत द्वारा धन-सम्पत्तिक हरण कऽ लेल गेलनि। घर-समाज सर्वत्र कलह उत्पन्न भऽ गेलनि आ ओ परम दरिद्र भऽ गेला। कौटिल्यक पत्नी कहलथिन- अनन्त भगवानक कोपक ई प्रतिफल थिक। कौटिल्य व्याकुल भेल वने-वन यत्र-तत्र अनन्त-दर्शन हेतु बताह जकाँ गाछ-वृक्षसँ पता पूछऽ लगला आ अन्तमे प्राण-त्याग करबा लेल उद्यत भऽ गेला। ई देखि अनन्त स्वरूप   भगवान विष्णु वृद्ध ब्राह्मणक रूप धारण कऽ सम्मुख उपस्थित भेलथिन आ अपन चतुभुर्ज रूपमे कौटिल्यकेँ दर्शन देलथिन। कौटिल्य अनेकानेक स्तुतिसँ भगवानकेँ प्रसन्न केलनि। भगवान पुन: अनन्त व्रत आ पूजाक उपदेश देलथिन। भगवानक आज्ञासँ 14 वर्ष धरि कौटिल्य अनन्तक पूजा केलनि आ समस्त सांसारिक ऐश्वर्यक भोग करैत अन्तमे स्वर्गारोहण केलनि। एहि कथाक भविष्य पुराणमे आरो विस्तारसँ वर्णन अछि।


एना करी भगवान अनन्तक पूजन

 पूजाक ओरियान : पूजाक स्थानकेँ पवित्रपूर्वक नीपि, पिठारसँ अष्टदल अरिपन लिखि ओहिमे सिन्दुर लगा ओहिपर एकटा आमक पल्लव देल कलश राखी। कलशमे सिन्दुर-पिठार लागल रहय। पूजाक लेल अनन्तक संग डालीमे सामयिक फलक संग-संग पकमान आदि राखी। तखन पूजा केनिहार हाथमे जल लऽ शुचि मन्त्र पढ़थि-ऊँ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोपि वा।य: स्मरेत पुण्डरीकाक्ष: स बाह्याभ्यन्तर: शुचि:।।मंत्र पढ़बाक बाद हाथक जल यावन्तो पूजा सामिग्री के शिक्त करैत अपना शरीरपर सेहो छीटी। सूर्यादि पंचदेवताक पूजा :  हाथमे अक्षत लऽ ऊँ सूर्यादि पंचदेवता इहागच्छ इहतिष्ठ। हाथक अक्षत पातपर राखि अर्घामे जल लऽ- एतानि पाद्यार्घाचमनीय स्रानीय पुनराचमनीय सूर्यादि पंचदेवताभ्यो नम:। जल चढ़ा फूलमे चानन लऽ- इंदमनु लेपनंसूर्यादि पंचदेवताभ्यो नम:। अक्षत- इदमक्षतं सूर्यादि पंचदेवताभ्यो नम:। फूल- एतानि पुष्पानि सूर्यादि पंचदेवताभ्यो नम:। दूबि- इदं दुर्बादलं सूर्यादि पंचदेवताभ्यो नम:। विल्वपत्र- इदं विल्वपत्रं सूर्यादि पंचदेवताभ्यो नम:। अर्घामे जल लऽ- एतानि धूप-दीप ताम्बूल यथाभाग नानाविधि नैवेद्यानि सूर्यादि पंचदेवताभ्यो नम:। पुन: अर्घामे जल लऽ- इदमाचमनीयं ऊँ सूर्यादि पंचदेवतभ्यो नम:। तखन एकटा फूल लऽ - एष पुष्पांजलि ऊँ सूर्यादि पंचदेवताभ्यो नम:। तहन हाथमे तेकुशा तिल जल लऽ संकल्प :- ऊँ अद्य भाद्रमासीय शुक्लपक्षीय चतुर्दश्याम तिथौ अमुकशर्माहं (अपन  नाम ली) परमानन्त प्रीतिपूर्वकैहिक वहुगोधनधान्य रत्नादिमत्त्व- कल्पान्तस्थायि पुनर्वसु नक्षत्र यवन कामया अनन्त व्रत महंकरिष्ये। ई संकल्प कऽ पूजा आरम्भ करी। पीढ़ीपर कमलक जे अरिपन ताहिपर देल जे कलश ताहिमे कुशक अनन्त महाराज बना ओकरा जनउसँ लपेटि कऽ राखि दी। तहन हाथमे तिल लऽ- ऊँ मनोजूतिर्जुषतामाज्यस्य वृहस्पतिर्यज्ञमिमन्तनोत्वरिष्टं यज्ञं समिमं दधातु विश्वेदवास इह मादयन्तामोम्प्रतिष्ठ। ऊँ भगवन अनन्त इह सुप्रतिष्ठतो भव। हाथक तिल ओहि कुशक बनल अनन्तपर चढ़ा हुनका प्रतिष्ठित कऽ हाथमे फूल लऽ दुनू हाथ जोड़ि कऽ - फणासप्तान्वितं देवं चतुर्वाहुं किरीटिनम्। नवाम्रपल्लवाभांस पिंगलस्मश्रुलोचनम्। पिताम्बरंधरं देव शंखचक्रगदाधरम्। कराग्रे दक्षिणे शंखं तपस्यप्यश: करे। चक्रमूद्धवे तथा वामे गदातस्याप्यध: करे। दधानं पद्मं सर्वलोकेशं सर्वाभरणभूषितम्। क्षीराबिधमध्ये श्रीमन्तमनन्तं चन्तयेद्धरिम्। ई पढ़ि हाथक फूल चढ़ा दियनि। पुन: अक्षत लऽ - ऊँ आगच्छानन्तदेवेश तेजो राशे जगत्पते। क्रियमाणां मया पूजां गृहाण सुरसत्तम। ऊँ  अनन्त इहागच्छ इहतिष्ठेत्यावाह्य। हाथक अक्षत पातपर धऽ अर्घामे जल लऽ - ऊँ गंगा च यमुनाचैव नर्मदा च सरस्वती। ताप्तीपयोष्णी रेवा ताभ्य: स्रानार्थ माहृतम। एतानि पाद्यार्घाचमनीय स्रानीय पुनराचमनीय ऊँ अनन्ताय नम:। वस्र- इदं पीतवस्रं वृहस्पति दैवतम् ऊँ अनन्ताय नम:। यज्ञोपवीत - इमे सोत्तरीय यज्ञोपवीते वृहस्पति दैवतम् ऊँ अनन्ताय नम:। चानन- इदमनु लेपनम वृहस्पति दैवतम् ऊँ अनन्ताय नम:। तिल जौ- एते यवतिला वृहस्पति दैवतम् ऊँ अनन्ताय नम:। फूल- एतानि पुष्पानि वृहस्पति दैवतम् ऊँ अनन्ताय नम:। माला- इदं पुष्पमाल्यं वृहस्पति दैवतम् ऊँ अनन्ताय नम:। दूबि- इदं दुर्वादलं वृहस्पति दैवतम् ऊँ अनन्ताय नम:। तुलसी- इदं तुलसी पत्रम् वृहस्पति दैवतम् ऊँ अनन्ताय नम:। जल लऽ एतानि गन्ध-पुष्प धूप-दीप ताम्बूल नानाविधि नेवैद्यानि वृहस्पति दैवतम् ऊँ अनन्ताय नम:। जल लऽ- इदमाचमनीयं वृहस्पति दैवतम् ऊँ अनन्ताय नम:। एकटा फूल- एष पुष्पाञ्जलि ऊँ अनन्ताय नम:।तखन बलभद्रक पूजा : हाथमे अक्षत लऽ - ऊँ भूर्भूव: स्व: बलभद्र इहागच्छ इहतिष्ठेत्यावाह्य। अर्घामे जल लऽ- एतानि पाद्यार्घाचमनीय स्रानीय पुनराचमनीय ऊँ बलभद्राय नम:। चानन-इदमनु लेपनम् ऊँ बलभद्राय नम:। तिल- एते तिला: ऊँ बलभद्राय नम:। फूल- एतानि पुष्पाणि ऊँ बलभद्राय नम:। माला- इदं पुष्पमाल्यम ऊँ बलभद्राय नम:्। दूबि- इदं दूर्वादलं ऊँ बलभद्राय नम:। अर्घामे जल लऽ- एतानि गन्ध-पुष्प धूप-दीप ताम्बूल यथाभाग नानाविध नैवेद्यानि ऊँ बलभद्राय नम:। जल लऽ- इदमाचमनीय ऊँ बलभद्राय नम:। एकटा फूल लऽ- एष पुष्पाञ्जलि ऊँ बलभद्राय नम:। सुमन्तक पूजा : हाथमे अक्षत लऽ - ऊँ भूर्भूव: स्व: सुमन्त इहागच्छ इहतिष्ठेत्यावाह्य। अर्घामे जल लऽ- एतानि पाद्यार्घाचमीनय स्रानीय पुनराचमनीय ऊँ सुमन्ते नम:। चानन- इदमनु लेपनम् ऊँ सुमन्तवे नम:। अक्षत- इदमक्षतं ऊँ सुमन्तवे नम:। फूल- एतानि पुष्पानि ऊँ सुमन्तवे नम:। दूबि- इदं दूर्वादलं ऊँ सुमन्तवे नम:। अर्घामे जल लऽ - एतानि गन्ध-पुष्प धूप-दीप ताम्बूल यथाभाग नानाविधि नैवेद्यानि ऊँ सुमन्तवे नम:। जल- इदमाचनीय ऊँ सुमन्तवे नम:। एकटा फूल लऽ- एष पुष्पाञ्जलि सुमन्तवे नम:।एही तरहेँ दीक्षा पूजन, इन्द्रादि दशादिक्पाल, नवग्रह केर पूजन करी। एही तरहेँ हृषीकेशोसि। ऊँ पद्मनाभोसि। ऊँ माधवोसि। ऊँ बैकुण्ठोसि। ऊँ श्री धरोसि। ऊँ त्रिविक्रमोसि। ऊँ मधुसूदनोसि। ऊँ वामनोसि। ऊँ केशवोसि। ऊँ नारायणोऽसि। ऊँ दामोदरसि। ऊँ गोविन्दोसि केर उच्चारण करैत पञ्चोपचार पूजा कऽ प्रदिक्षणा कऽ प्रार्थना करी। तखन पुराने अनन्तक डोर स्पर्श कऽ पढ़ी - ऊँ सव्वंत्सरकृतां पूजां संपाद्य विधिवन्मम्। व्रजे दानी सुरश्रेष्ठ ह्यनन्त फलदायक।। न्यूनातिरिक्तानि परिस्फुटानि यानीह कर्माणि मया कृतानि। सर्वाणि चैतानि मम क्षमस्व प्रयाहि तुष्ट: पुनरागमाय। एहि तरहेँ पुरान डोरक विर्सजन कऽ फुलही बासनमे गायक दूध दऽ ओहिमे नव अनन्त डोरा राखि पुरान डोरा लऽ मथल जाइछ। मथनिहारकेँ पुछल जाइछ- की   मथै छी? पूजक केर उत्तर- क्षीर समुद्र। प्रश्न- की तकै छी? उत्तर- अनन्त भगवान। प्रश्न- भेटला? उत्तर- हँ। तहन स्वस्ति प्राप्त कऽ अनन्तकेँ उठाय माथमे सटा प्रणाम कऽ विर्सजन करी। तथा नव डोराकेँ प्रणाम करी आ मन्त्रक संग अनन्त बान्ही। 

डॉ विद्याधर मिश्र
विभागाध्यक्ष स्नातकोत्तर व्याकरण विभाग
कासिंद संस्कृत विश्वविद्यालय
साभार : मिथिला आवाज मैथिली दैनिक समाचार पत्र में प्रकाशित इ लेख


Sunday, September 15, 2013

नैतिकतासँ परिपूर्ण हो जनमानस

 दिल्लीक फास्ट ट्रैक कोर्ट द्वारा चारि गोट दुष्कर्मीकेँ फाँसीक सजाय सुनाओल जाइते सौँसे देशक संवेदना एक संग उजागर भऽ गेल। बेसी ठाम कहल गेल जे ई ऐतिहासिक निर्णय अछि। ईहो कहल गेल जे एहि सजायसँ दुष्कर्मक घटना कम होयत। आइसँ लगभग नओ मास पूर्व 16 दिसम्बर 2012 केँ बसमे एकगोट युवतीक संग भेल सामूहिक दुष्कर्म आ अन्तत: सिंगापुरमे 29 दिसम्बर 2012 केँ पीड़िताक मृत्युक घटना सौँसे देशकेँ उद्वेलित कऽ देने छल। समाजक कोनो एहन वर्ग नञि छल जे उद्वेलित नञि भेल हो। उचिते, एहन हेबाके चाही छल। एहि घटनाक आरोपी सभकेँ मृत्यु-दण्ड भेटबाक स्वागतो हेबाक चाही छल, जे भेल। कोर्टक निर्णयसँ समाजमे कठोर सन्देशो जायत। दुष्कर्मीकेँ एते डर तँ अवश्ये हेतै जे पकड़ल जेबापर मृत्यु-दण्डो भेटि सकैत अछि, मुदा विचारणीय अछि जे की एहीसँ दुष्कर्म सन घृणित काज रुकि जायत? कदापि नञि। मात्र कानून बनेबा भरिसँ काज चलऽ वला नञि अछि। अपना देशमे एहिसँ पहिनो तँ दुष्कर्मीकेँ मृत्यु-दण्ड देल गेल अछि। रंगा-बिल्ला सन राक्षसकेँ आ ओकर दुष्कृत्यकेँ चाहियो कऽ हमरा लोकनि बिसरि सकै छी? ओकरो मृत्यु-दण्ड देल गेल छल। की तकर बाद घटना रूकल? असलीहतमे ई दिन-प्रतिदिन बढ़ले गेल। दोसर बात अछि, एक घटनामे चारि गोटेकेँ फाँसी देबाक सजाय सुनाओल गेल अछि, जेँ मीडिया एहि दुष्कर्मकेँ जमि कऽ रखलक तेँ ने सगरो देशक नजरि एहिपर छल। देशमे प्रतिदिन एहि तरहक घटना तँ भैए रहल अछि। जाहि समय दिल्ली-दुष्कर्म काण्ड देश-विदेशमे चर्चित छल ताहू समयमे एहि तरहक घटना भऽ रहल छल। थोड़े बीचे तँ जेना ई व्याधिक रूप पकड़ि नेने छल। संक्रामक रोग जकाँ। चारू भरसँ एही तरहक समाचार आबि रहल छल। की हमरा लोकनिक संवेदना ओहि सभ बच्ची, किशोरी, युवती आ विवाहिता लोकनिसँ नञि जुड़बाक चाही जे दुष्कर्म सन यातना भोगलनि? हुनका सभक प्रति हमरा लोकनिक संवेदनशील किए ने भेलहुँ। एखनो समाचार पत्रमे नित्य कतहु ने कतहुसँ एहि तरहक घटना सोझाँ आबिए रहल अछि। आर तँ आर परिजन पर्यन्त द्वारा दुष्कर्मक घटना भऽ रहल अछि। कहल जाइत अछि जे देशमे जते दुष्कर्मक घटना होइत अछि ताहिमेसँ अधिकांश सोझाँ नञि अबैत अछि। जँ ओहो सभ सोझाँ आबय तखन केहन भयावह स्थिति होयत? दुष्कर्मक एहन पीड़िता सभकेँ कहिया न्याय भेटतनि? भेटबो करतनि की? हुनका सभकेँ न्याय भेटनि ताहि लेल हमरा लोकनि किए ने किछु करै छी? की मीडिया जाहि-जाहि घटनाकेँ उठायत ततबेसँ हमरा लोकनि सरोकार राखब? एहन बहुत रास प्रश्न अछि जे आइएसँ नञि बरखो-बरखसँ अनुत्तरित अछि। तहिना अनुत्तरित अछि जे एहि तरहक घटनाक स्थायी सामाधान लेल किए ने ठोस डेग उठाओल जाइत अछि? रोगक बदला रोगीक उपचार करबा दिस हमरा लोकनि किए अपनाकेँ केन्द्रित केने छी?

स्थायी निदान नैतिक शिक्षा

दुष्कर्मक घटनापर रोक लेल कानून बनाओल जा रहल अछि, मुदा कानून बनेबे भरिसँ काज चलऽ वला रहैत तँ देश भ्रष्टचारमे आकण्ठ नञि डूबल रहैत। दहेज प्रथाक कहिया ने सराध भऽ गेल रहितै। दहेज लेल कोनो नव विवाहिताकेँ जिबिते नञि डाहल जाइत। एहन बहुत रास उदाहरण देल जा सकैत अछि जाहि लेल कानून बनल अछि, कठोर सजायक प्रावधान अछि, तथापि एकर स्थायी निदान नञि भऽ रहल अछि। प्रयोजन अछि समाजकेँ सद्मार्गपर लऽ जेबा लेल रोगक उपचार कयल जेबाक। एखन रोगीक उपचार करबामे हम सभ जुटल छी आ एहीसँ सन्तुष्ट भऽ रहल छी। बूझि रहल छी जे एकरा समाप्त कऽ देल। दुष्कर्मक घटनामे चारि गोटेकेँ फाँसकी सजाय भेटबाकेँ आ महिलाक संग आपराधिक घटना लेल कानून बना जँ यैह बुझै छी तँ हमरा लोकनि अपनाकेँ फुसिया रहल छी। बात पुरनायत आ आयल-गेल भऽ जायत। जँ एहि तरहक रोगक चिकित्साक स्थायी समाधान चाहै छी तँ एहि लेल रोगक ओहि कारणकेँ ताकऽ पड़त जे मूलमे अछि। से अछि नैतिक पतन। कहियो कोनो कार्यालयमे काज हेबापर जँ कर्मीकेँ दस-बीस टाका क्यौ देबऽ चाहै छला तँ ओ हाथ जोड़ि लै छल आ कहै छल ‘नञि-नञि एना नञि करू, बाल-बच्चा वला छी, घूस-पेंच लेब तँ बाल-बच्चापर पड़ि जायत’, माने नैतिकता ओकरा ओ राशि लेबासँ रोकै छल। आइ परिस्थिति सर्वथा उनटि गेल अछि, आइ ओही कार्यालयक कर्मी कहैत अछि ‘किछु दियौ बाल-बच्चा वला छियै, कहाँसँ पढ़ेबे-लिखेबै, सुदुक दरमाहासँ काज नञि ने चलै छै महगीमे।’ नेनपनेसँ रटायल जाइ छल-
मातृवत    परदारेषु    परद्रव्येषु  लोष्ठवत।
आत्मवत सर्वभूतेषु य: पश्यति स: पण्डित:।।
अर्थात् दोसराक स्त्रीकेँ माताक समान, दोसराक धनकेँ ढेपा सन आ अपने सन सभकेँ देखनिहार पण्डित थिका।
तहिना-
अष्टादश पुराणेषु  व्यासस्य वचनद्वयम्।
परोपकाराय पुण्याय, पापाय परपीडनम् ।।
अर्थात् अठारहो पुराणमे व्यासक दुइए टा वचन छनि जे दोसराक उपकार करब पुण्य थिक आ दोसराकेँ पीड़ा पहुँचायब पाप।
एहि तरहक नीति-वचनक असरि काँच मानसिकतापर होइ छल। जेना-जेना नेनाक बौद्धिक विकास होइ छल तहिना-तहिना नैतिक शिक्षाक स्तरो बढ़ै छल। नैतिकताक पाठ मात्र घोखबा लेल नञि होइ छल नेना-किशोरकेँ ओकरा आत्मसात करबा लेल प्रेरित कयल जाइ छल। आइ हमरा लोकनि एहि बाटकेँ छोड़ि चुकल छी। प्राचीन सभ परिभाषा आ मान्यताकेँ उनटि देबा लेल प्रयासरत छी। कहल जाइ छल-
विद्या ददाति विनयम विनयाद्याति पात्रताम्।
पात्रत्वात्धनमाप्नोति धनात धर्म: तत: सुखम्।।
अर्थात् विद्या ओ थिक जे   विनयशीलता दैछ आ ओहिसँ पात्रता अबैत अछि, पात्रताक संग अर्जित धन लऽ धर्म केने सुख होइत अछि। आजुक सन्दर्भमे जँ एहि परिभाषापर विचार करी तँ सयमे निनानबे गोटे डिग्रीधारी लग विद्या नञि छनि कारण ओ विनयशील नञि छथि। तकर अर्थ भेल जे पात्रताक अभाव सेहो अछि। आ जे पात्र नञि होयत तकरासँ नैतिकताक अपेक्षा कऽ सकै छी की? आब एहि नीति वचन सभक सन्दर्भमे वर्त्तमान समस्याकेँ देखी। की लोक जँ हृदयसँ दोसराक स्त्रीकेँ अपन माय जकाँ मानय तँ दुष्कर्म सन घटना होयत? कदापि नञि। कमसँ कम एहन स्थिति तँ नहिञे ने रहत जेना आइ मानव अपन मूल धर्मकेँ छोड़ि पशु बनि गेल अछि। जे पुण्य-पापक चिन्ता करत से दानवी कृत्य नञि कऽ सकैत अछि। जे आनक धनकेँ ढेपा बूझत से भ्रष्टाचारी भैए ने सकैत अछि। जे विनयशील होयत से घृणित काज कैए ने सकैत अछि। तेँ प्रयोजन अछि नैतिक पतनशीलताक रोगकेँ चीन्हि उपचार कयल जाय जाहिसँ शरीरपर दाग भने रहि जाय, घाव अवश्य छूटि जायत।

संस्कृतक चरणमे चाही शरण 

नैतिक पतनशीलतापर विराम लेल संस्कृतक शरणमे देशकेँ लऽ जायब परमावश्यक अछि। कारण संस्कृत एहि नैतिक शिक्षाक अथाह सागर अछि। एही भाषामे भारतक आत्मा बसैत अछि। जते ई उचित-अनुचित, न्याय-अन्याय, पुण्य-पाप, सत्कर्म-दुष्कर्मक प्रसंग मार्ग-दर्शन करैत अछि तते आन कोनो भाषा नञि। भाषाक संग संस्कृति चलैत अछि। संस्कृतक संग भारतक संस्कृति अपन मूल अर्थमे चलैत अछि। एकर प्रचार-प्रसार सकल समस्याक निदान कऽ सकैत अछि, मुदा दुर्भाग्यसँ वर्त्तमान ओहि संस्कृतकेँ लतिएने-कतिएने अछि जे वैज्ञानिक विकासक आधार बनि रहल अछि, जे कर्म ज्ञान दैत अछि, जे सिखबैत अछि जे धन महत्वपूर्ण अछि, मुदा ओहूसँ महत्वपूर्ण अछि मानव जीवन, जे पढ़बैत अछि जे भौतिक सुख क्षणभंगुर अछि, जे बाट देखबैत अछि जे नित्य दिस बढ़ू अनित्य दिस नञि, मुदा जेना-जेना कथित विकास भऽ रहल अछि तहिना-तहिना वर्त्तमान संस्कृत दिससँ मुँह मोड़ि रहल अछि। जाहि भाषाक बलपर भारतकेँ विश्व गुरुक सिंहासन भेटल से उपेक्षित अछि। जाहि गुण-गरिमा लेल भारत विश्वमे जानल-चीन्हल जाइत रहल अछि तकर मूल संस्कृतेमे अछि, मुदा पाश्चात्यक प्रति आकर्षणक कारणेँ संस्कृतमे वर्णित तथ्य खिस्सा-पिहानी लगैत अछि आ पाश्चात्य जखन ‘गाड पार्टिकल’ तकबाक बात करैत अछि तँ ओहिपर विश्वास होइत अछि, जखन कि संस्कृत आरम्भेसँ एकर उद्घोष करैत रहल अछि। की अपन स्वर्णिम अतीतपर अविश्वास करब, ओकरा अनुपयोगी बुझबे विकास थिक?

यैह थिक विकास? 

विकासक सन्दर्भमे विचार करै छी तँ मन पड़ैत अछि एक गोट पत्रकार मित्रक कथन। एक बेर एक गोट पत्रकार मित्र दरभंगा आयल छला। ओ कहलनि जे किछु छात्रा सभसँ बात कऽ रिपोट बनाउ। हुनकर सभक फोटो सेहो लऽ लेब। दोसर दिन पुछलनि तँ कहलियनि जे छात्रा सभ ओहि विषयपर बातो करबा लेल तैयार नञि भेली। फोटो तँ एकदम्मे ने घिचेलनि। पत्रकार मित्र दुखी होइत कहलनि- ‘एखन ई शहर विकास नञि केलक अछि। हमरा ओहि ठाम चलू छात्रा आ युवती लोकनिकेँ जेना कहबनि तेना फोटो घिचा लेती। एक गोटेकेँ कहबनि तँ समस्या भऽ जायत। तराउपरी होबऽ लागत। अखन दरभंगा सभकेँ विकास करबामे समय लगतै।’ ई कहैत ओ अपन टी शर्टकेँ दुनू बाँहिपर नीचा ससारैत कहने छला- ‘एना फोटो घिचा लेत। जेना कहबै तेना घिचा लेत।’ ओ मुसुकैत अपना संग आयल मित्र दिस तकने छला आ ओहो समर्थन केलनि। हम आश्चर्यचकित रहि गेल रही जे की यैह विकास थिक जाहिसँ दरभंगा वञ्चित अछि? मनमे आयल छल जे जँ यैह विकास अछि तँ भने हमरा सभ पछुआयल छी। ई प्रकरण तँ बानगी भरि अछि। सगरो देशमे देह-यष्टिक प्रदर्शनकेँ विकास बूझल जा रहल अछि। हमरा लोकनि आँखि मूनि पाश्चात्यक अनुकरण कऽ रहल छी। पहिरन-ओढ़न आ विचार पर्यन्तमे। वस्त्रक उपयोग शरीरक झँपबा लेल होइ छल, आइ उनटि गेल अछि। आइ वस्त्रक उपयोग प्रदर्शन लेल होइत अछि। अंग-प्रदर्शन फैशनक नामपर सर्व स्वीकार्य भऽ गेल अछि। से तेना जे कहियो नायिकाक नग्न पीठ केर फोटो टीभीपर आबि जाइ छल तँ एक संग बैसल पैघ आ छोट अपन नजरि दोसर दिस कऽ लै छला जेना ओ देखिए ने रहल होथि, आइ ‘बिकनी गर्ल’ केँ बाप-बेटा, भाइ-बहिन संग-संग देखि रहल छथि। पहिने कहल जाइ छल ‘आप रुचि भोजन पर रुचि सिङार’, आइ पर रुचि भोजन आ आप रुचि सिङार भऽ गेल अछि। एहि ठाम प्रश्न उठि सकैछ जे की महिलाक विकास नञि हेबाक चाही, अवश्य हेबाक चाही, मुदा ओ वास्तविक विकास हो। आचार-विचारक विकास हो। शिक्षाक विकास हो। हुनक मानसिक-बौद्धिक विकास हो। विकासक नामपर महिलाकेँ वस्तु बना देबाक पाश्चात्य मानसिकतासँ हुनक केहन विकास भऽ रहल अछि से सभक सोझाँ अछि। विकासक बोल दऽ हुनका जेना-जेना आगाँ बढ़ेबाक बात भऽ रहल अछि, तहिना-तहिना ओ असुरक्षित भेल जा रहल छथि। हुनकापर सर्वत्र प्रताड़ना भऽ रहल छनि। ‘नारयस्तु यत्र पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’ केर भावना खेलौड़ भऽ गेल अछि। जे विचार देवताक अस्तित्वे ने मानत से नारीक पूजाक बात कोना करत? हमरा लोकनि विकासक नामपर देशकेँ विदेशमे बदलने जा रहल छी तखन तदनुकूलेने परिणाम बहार होयत?

व्यवस्थो बदलय मानसिकता 

वर्त्तमान परिवेश लेल सरकारो दोषी अछि। ओ शराबक दोकान धुरझाड़ फोलि लोककेँ शराब पीबासँ होबऽ वला नोकसानक उपदेश दैत अछि। सिगरेट फैक्ट्रीकेँ लाइसेंस दैत अछि आ ओहिपर ‘स्वास्थ्य लेल   हानिकारक’ हेबाक वाक्य लीखबा अपन कर्त्तव्यक इतिश्री कऽ लैत अछि। ई केहन हास्यास्पद अछि जे एचआइवीसँ बचेबा लेल नैतिक रूपसँ युवा पीढ़ीकेँ मजगूत नञि कऽ निशुल्क निरोधक मशीन लगा एहिसँ बचाव केर प्रयास होइत अछि। की सुरक्षित सम्बन्ध लेल ई प्रेरित करब नञि मानल जायत? की एहिसँ नीक ई नञि होइत जे सामाजिक मान्यताक प्रतिकूल आचरण करबासँ रोकबा लेल कोनो ठोस उपाय कयल जाइत? युवा पीढ़ीकेँ नैतिक बलसँ परिपूर्ण कयल जाइत? मुदा ई हो कोना, जखन व्यवस्थो भारतीय परम्परा, संस्कृतिक प्रति रञ्च मात्रो आग्रही नञि रहि गेल हो।

जागऽ पड़त समाजकेँ 

सत्य पूछल जाय तँ नैतिकताक पतनपर अंकुश लेल समाजकेँ इमनदारीसँ जागऽ पड़त। जाबत सामाजिक जागरण नञि होयत एहि सभ समस्याक स्थायी समाधान मात्र कानून बनेबासँ कदापि नञि होयत। दुष्कर्मी, भ्रष्टचारी आदि सेहो तँ एही समाजक किनको भाइ, भतीजा वा आन कोनो सम्बन्धी होइ छथि। जँ समाज जागि जाय आ अपन सन्ततिमे नैतिक गुण भरबा लेल संकल्पित हो तँ व्याप्त सकल कुकृत्यक निदान सहजतासँ भऽ सकत। सभ क्षेत्रमे समाजेसँ तँ लोक जाइ छथि। ओ राजनीतिक क्षेत्र हो, प्रशासनिक क्षेत्र हो, व्यावसायिक क्षेत्र हो वा आन कोनो क्षेत्र, सभ ठाम नीक-अधलाह कर्म केनिहार तँ समाजेक क्यौ ने क्यौ होइ छथि। समाज अपन बेटी-धीक चिन्ता करत तखने मानवता गर्वसँ अपन माथ ऊँच कऽ चलि सकत। नञि तँ एहिना माथ झूकल रहत। की झूकल माथ मात्र ओकरे होइत अछि जे कुकृत्य करैत अछि, ओकरा संग ओकर समाजक माथ नञि झुकैत अछि? आउ जागी आ सुन्दर-स्वच्छ समाजक निर्माण लेल बेटा-बेटी दुनूकेँ रटाबी ‘मातृवत परदारेषु....।’

मिथिला आवाज मैथिली दैनिक समाचार पत्र केर 15.09.2013 के रविवासरीय अंक में प्रकाशित

Sunday, September 8, 2013

कलंकसँ उबारै छथि चौठी चान : चौरचनपर विशेष

चतुर्थी सूर्यास्तक बाद अढ़ाइ घण्टा धरिक, लेल जाइछ। जँ तिथि दू दिन एहि समयमे पड़य तँ अगिला दिन व्रत ओ पूजा हो। भरि दिन व्रत कऽ साँझखन आङनमे पिठारसँ अरिपन देल जाइछ। गोलाकार चन्द्र मण्डलपर केराक भालरि (पात) दऽ ओहिपर पकमान, मधुर, पायस आदि राखी। मुकुट सहित चन्द्रमाक मुँहक अरिपनपर केराक भालरि दऽ रोहिणी सहित चतुर्थी चन्द्रक पूजा उज्जर फूल (भेँट, कुन्द, तगर आदि) सँ पच्छिम मुहेँ करी। परिवारक सदस्यक संख्यामे पकमान युक्त डाली आ दहीक छाँछीकेँ अरिपनपर राखी। केराक घौर, दीप युक्त कुड़वार (माटिक कलश), लावन आदिकेँ अरिपनपर राखी। एक-एक डाली, दही, केराक घौर उठाऽ ‘सिंह: प्रसेन...’ मंत्रक संग ‘दधिशंखतुषाराभम्...’ मन्त्र पढ़ि समर्पित करी। प्रत्येक व्यक्ति एक-एक फल हाथमे लऽ ओहि मन्त्रसँ चन्द्रमाक दर्शन कऽ प्रणाम करी। एहि दिन भिनसरेसँ स्त्रीगण सभ पकमानक सामग्री जुटेबामे लागि जाइ छथि। दुपहरमे पूड़ी, ठकुआ, पिड़ुकिया, मालपूआ आदि बनेबामे व्यस्त रहै छथि। कुशी अमावस्येसँ दहीक जोगाड़, डाली-छाँछीक व्यवस्था करै छथि।

भादव मासक शुक्ल पक्षक चतुर्थी (चौठ) तिथिमे साँझखन चौठचन्द्रक पूजा होइत अछि जकरा लोक चौरचन पाबनि कहै छथि। एहि समय चन्द्रमा कनी काल रहि डूबि जाइ छथि आ बरसातक कारण मेघ रहबापर तँ दुर्लभे रहै छथि। एहि दुर्लभताक कारणेँ लोकमे प्रचलित अछि जे कोनो व्यक्तिकेँ बहुत दिनपर देखबापर कहै छथि जे अहाँ तँ ‘अलख चान’ (अलक्ष्य चान) भऽ गेलहुँ। कतहु एकरे ईहो कहल जाइत अछि जे अहाँ ‘चौठी चान’ भऽ गेल छी।
पुराणमे प्रसिद्ध अछि जे चन्द्रमाकेँ एहि दिन कलंक लागल छलनि। तेँ एहि समयमे हुनक दर्शनकेँ दोषावह मानल जाइछ। मान्यता अछि जे एहि समयक चन्द्रमाक दर्शन करबापर फूसिक कलंक लगैत अछि। एहि दोषक निवारण करबाक लेल ‘सिंह: प्रसेन’ वला मन्त्रक पाठ कयल जाइत अछि।
ई मिथिलासँ भिन्न प्रान्तक व्यवहार थिक। मिथिलामे भादवक इजोरियाक चौठमे मिथ्या कलंक नञि लागय ताहि हेतु रोहिणी सहित चतुर्थी चन्द्रक पूजा होइछ। एकर कथा स्कन्द पुराणमे अछि- श्रीकृष्ण भगवानकेँ एक बेर मिथ्या कलंक लागि गेलनि जे ओ प्रसेन नामक यादवकेँ मारि ‘स्यमन्तक’ नामक मणि लऽ नुका कऽ रखने छथि, जखन कि ओ एहन काज नञि केने छला। ओ प्रसेनकेँ ताकऽ वन गेला तँ ओतऽ ओकर मृत शरीरकेँ देखलनि। ओतऽ एक गुफाक भीतर गेला तँ एक दाइ (बच्चा खेलेनिहारि) केर हाथमे मणि देखलनि। ओ बच्चाकेँ कहि रहल छल- सिंह प्रसेनकेँ मारलक, ओहि सिंहकेँ जाम्बवान् मारलनि, तेँ हे सुकुमार (जाम्बावनक पुत्र)! अहाँ जुनि कानू, ई स्यमन्तक मणि अहीँक थिक-

‘सिंह: प्रसेनमवधीत्, सिंहो जाम्बवता हत:।
सुकुमारक! मा रोदी:, तव एष स्यमन्तक:।।’

यैह वाक्य श्रीकृष्णकेँ कलंकसँ मुक्त केलकनि। तेँ एहि श्लोककेँ पढ़ि चौरचनमे चन्द्रमाकेँ देखबासँ लोक कलंक मुक्त होइ छथि। जाम्बवान् हुनका मणिक संग जाम्बवती कन्या सेहो देलनि। श्रीकृष्ण घर आबि ओ मणि सत्राजित्केँ दऽ कलंक मुक्त भेला, परञ्च शतधन्वा नामक यादव  सत्राजित्केँ मारि मणि लऽ अक्रूरकेँ दऽ घोड़ापर चढ़ि भागल। अक्रूर मणि लऽ चुपचाप काशी चलि गेल आ श्रीकृष्ण ओ बलराम मणिक हेतु शतधन्वाकेँ खेहारलनि। बाटमे श्रीकृष्ण ओकरा मारलनि, मुदा मणि नञि भेटलनि। बलदेवकेँ कृष्णपर अविश्वास भेलनि जे ई मणि नुका कऽ फूसि बजै छथि। पुन: श्रीकृष्णकेँ कलंक लगलनि। तखन ब्रह्माक उपदेशसँ चौरचन पूजा कऽ कलंक मुक्त भेला।
ईहो कथा अछि जे एक बेर गणेश भगवानकेँ देखि चन्द्रमा हँसि देलथिन। एहिपर ओ चन्द्रमाकेँ सराप देलथिन जे अहाँकेँ देखबासँ लोक कलंकी होयत। तखन चन्द्रमा भादव शुक्ल चतुर्थीमे गणेशक पूजा केलनि। ओ प्रसन्न भऽ कहलथिन- अहाँ निष्पाप छी। जे व्यक्ति भादव शुक्ल चतुर्थीकेँ अहाँक  पूजा कऽ ‘सिंह प्रसेन...’ मन्त्रसँ अहाँक दर्शन करत तकरा मिथ्या कलंक नञि लगतै ओकर सभ मनोरथ पुरतै।
ई चतुर्थी सूर्यास्तक बाद अढ़ाइ घण्टा धरिक, लेल जाइछ। जँ तिथि दू दिन एहि समयमे पड़य तँ अगिला दिन व्रत ओ पूजा हो। भरि दिन व्रत कऽ साँझखन आङनमे पिठारसँ अरिपन देल जाइछ। गोलाकार चन्द्र मण्डलपर केराक भालरि (पात) दऽ ओहिपर पकमान, मधुर, पायस आदि राखी। मुकुट सहित चन्द्रमाक मुँहक अरिपनपर केराक भालरि दऽ रोहिणी सहित चतुर्थी चन्द्रक पूजा उज्जर फूल (भेँट, कुन्द, तगर आदि) सँ पच्छिम मुहेँ करी। परिवारक सदस्यक संख्यामे पकमान युक्त डाली आ दहीक छाँछीकेँ अरिपनपर राखी। केराक घौर, दीप युक्त कुड़वार (माटिक कलश), लावन आदिकेँ अरिपनपर राखी। एक-एक डाली, दही, केराक घौर उठाऽ ‘सिंह: प्रसेन....’ मंत्रक संग                ‘दधिशंखतुषाराभम्...’ मन्त्र पढ़ि समर्पित करी। प्रत्येक व्यक्ति एक-एक फल हाथमे लऽ ओहि मन्त्रसँ चन्द्रमाक दर्शन कऽ प्रणाम करी। दक्षिणा उत्सर्ग कऽ प्रसाद ग्रहण करी। चन्द्रमण्डलपर राखल प्रसादकेँ उपस्थित पुरुषवर्ग ओकर चारू भर गोलाकार पंक्तिबद्ध कऽ पातपर फराक-फराक भोजन कऽ ओही ठाम खाधि खूनि गाड़ि दी एकरा मड़र भाङब कहै छैक। बहुत ठाम पातपर राखल पायसक बीचो-बीच चानी अथवा सोनाक बनल वस्तुसँ चीरि माड़र भङबाक परम्परा सेहो अछि। पूजाक स्थानमे पूजाक निर्माल आदिकेँ गाड़ि दी।
एहि दिन भिनसरेसँ स्त्रीगण सभ पकमानक सामग्री जुटेबामे लागि जाइ छथि। दुपहरमे पूड़ी, ठकुआ, पिड़ुकिया, मालपूआ आदि बनेबामे व्यस्त रहै छथि। कुशी अमावस्येसँ दहीक जोगाड़, डाली-छाँछीक व्यवस्था करै छथि।
एहि पाबनिक उल्लेख रुद्रधर कृत वर्षकृत्य (1400 इ.), महेश ठाकुरक तिथितत्त्वचिन्तामणि (1560 इ.), अमृतनाथक कृत्यसारसमुच्चय (1800 इ.) इत्यादिमे अछि। एकर प्रचलन पहिने कम छल, मुदा 1600 इ.मे राजा हेमांगद ठाकुर एकर प्रचार सम्पूर्ण मिथिलाक घर-घरमे करा देलनि। सरकारी ‘कर’ नञि देबाक कारण ओ दिल्लीमे जहल भोगै छला। ओतऽ क्रमश: हजार वर्षक ग्रहण लगबाक सूची ‘ग्रहणमाला’ नामसँ बनेलनि। बादशाह हिनक गणितक परीक्षा केलनि। हेमांगद ठाकुर चन्द्रमासँ प्रार्थना केलनि जे हमर समयक अनुसार ग्रहण लगबापर जँ हम कर मुक्त होयब तँ सम्पूर्ण तिरहुतमे अहाँक पूजा धूमधामसँ करायब। सैह भेल। तेँ अपन राज्य आबि ढोलहो देया चौरचन मनबेलनि। एहिना 1800 इ.मे हरिनगरक पं. चन्द्रदत्त झा ‘भक्तमाला’ मे लिखै छथि जे हुनक माय चन्द्रमाक पूजा कऽ पुत्र प्राप्त केलनि, तेँ हिनक नाम चन्द्रदत्त पड़ल। चन्द्रमाक आराधनासँ बहुतो व्यक्तिक कामना पूर्ण भेलनि अछि। मिथिलाक विशेष पर्व चौरचन अपनामे एहि ठामक संस्कृति केर अनेक बिन्दुकेँ समेटने अछि।
चन्द्रमा प्रणाम मन्त्र-

‘दधि-शंख-तुषाराभं,   क्षीरोदार्णव-संभवम्।
नमामि शशिनं भक्त्या, शंभोर्मुकुटभूषणम्।।’

अर्थात् दही, शंख ओ बर्फक समान स्वच्छ, क्षीर सागरसँ उत्पन्न चन्द्रमा (शशि) केँ भक्तिसँ प्रमाण करैत छी जे महादेवक मुकुटक भूषण थिका।

पं. श्री शशिनाथ झा
स्नातकोत्तर व्याकरण विभाग
कासिंद संस्कृत विवि, दरभंगा

साभार : मिथिला आवाज दैनिक समाचार पत्र 

Wednesday, August 21, 2013

मिथिलामे पण्डिते बन्है छला रक्षा सूत्र

श्रावणी पूर्णिमा भाइ-बहिनक पवित्र प्रेमक प्रतीक पर्व रक्षाबन्धन किंवा राखीक रूपमे सगरो मनाओल जाइत अछि। देशक विभिन्न भागक संग मिथिलो एहि पर्वकेँ हर्षोल्लासक वातावरणमे मनबैत अछि। स्नान-पूजनसँ निवृत्त भऽ नव वस्त्र पहिरि बहिन अपना भाइ केर माथपर चानन लगबै छथि, हुनक आरती उतारै छथि आ रक्षासूत्र (राखी) बान्हि सदिखन अपन रक्षाक वचन लै छथि। भाइकेँ मिठाइ सेहो खोअबै छथि आ भाइ रक्षाक वचन दैत उपहार दै छथि। ई तँ अछि वर्त्तमान। कने अतीत दिस हुलकी मारू। ई जानि आश्चर्य लागत, हठात विश्वासे नञि होयत जे मिथिलामे पहिने मनाओल जाय वला रक्षाबन्धनक स्वरूप वर्त्तमानसँ मिसियो भरि मेल नञि खाइत अछि। मिथिलामे तँ ई भाइ-बहिनिक पाबनि कहियो रहबे ने कयल। मिथिलामे तँ भाइ-बहिनिक पाबनिक स्नेह-पर्व ‘भ्रातृ द्वितीया’ रहल अछि जे एखनो मनायल जाइत अछि। एकर अतिरिक्त ‘सामा’ सेहो एहि ठाम भाइ-बहिनिक पाबनि एहि ठाम मनायल जाइत अछि जाहिमे बहिन छठिक पारण दिनसँ सामा खेलाइ छथि आ कार्त्तिक पूर्णिमा दिन जखन सामाकेँ बिदा कयल जाइत अछि तखन भाइ सामाक डोलीकेँ कान्ह लगबै छथि, बहुत ठाम सामा तोड़ै छथि आ बहिन हुनक फाँड़ भरै छथि। एकर सत्यापन लेल इतिहास खँघारबा लेल बेसी पाछाँ जेबाक आवश्यकता नञि अछि। समाजमे एहन बहुत रास लोक भेटि जेता जिनक उमेर साठि-सत्तरि बरख छनि। कने हुनकासँ पूछि कऽ देखियौन जे जहिया नेना छला तहिया ओ अपना बहिनसँ राखी बन्हबेने छथि? एही उमेरक कोनो महिलासँ पूछि कऽ जाँचल जा सकैत अछि जे जेना एखन ई पाबनि मनाओल जाइत अछि तेना ओ अपना भाइकेँ राखी बन्हने छथि? उत्तर निश्चित रूपसँ नकारात्मक भेटत। एहि बयसक कोनो जाति-वर्गक मैथिल दू टूक कहता जे पहिने रक्षाबन्धनपर मिथिलामे बहिन अपना भाइकेँ राखी नञि बन्है छली। एहिसँ कमो उमेरक लोकक एहन उत्तर भेटि सकैत अछि। कतेको लोक ई कहि सकै छथि जे हुनका समयमे पण्डित-पुरहित बान्हथि, ओना बहिनो राखी बान्हब शुरू कऽ देने छली। यैह सत्य अछि। अपना ओहि ठाम पण्डिते-पुरहित रक्षासूत्र बान्हथि। हाल धरि रक्षाबन्धन दिन हाथमे रक्षासूत्र नेने यजमानकेँ बन्हबा लेल ठाम-ठाम पुरहित नजरि आबथि। एखनो ई परम्परा कतहु-कतहु चलैत अछि, मुदा आब नगण्य। अनुकरणक बिहाड़िमे अपन परम्पराकेँ हम सभ तेना उपेक्षित कऽ देलहुँ जे एखन बेसी दिन भेबो ने कयल अछि आ नवका पीढ़ीकेँ ई पतो नञि अछि जे रक्षाबन्धन एहि ठाम भाइ-बहिनिक पाबनि नञि छल। बहुत रास विद्वान एहि तथ्यकेँ लिपिबद्ध सेहो केने छथि। प्रसिद्ध पत्र ‘मिथिला मिहिर’ केर 1936 मे प्रकाशित ‘मिथिलांक’ मे ‘मिथिला में प्रचलित कुछ पर्व त्यौहार’ शीर्षक आलेखमे जीवानन्द ठाकुर लिखै छथि जे रक्षाबन्धनमे ब्राह्मण ‘येनबद्धो’ मंत्रसँ रक्षा (राखी) बन्है छथि। मैथिली भाषा-साहित्यक भीष्मपितामह कहल गेनिहार आचार्य सुरेन्द्र झा ‘सुमन’ अपन पोथी ‘मन पड़ैत अछि’ मे लिखने छथि जे सिनेमाक प्रभावेँ रक्षाबन्धन भाइ-बहिनिक पाबनि भऽ गेल। मैथिलीक शिखर-पुरुष पण्डित श्रीचन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’ अपन पोथी ‘अतीत मन्थन’ मे लिखै छथि ‘आइ रक्षा बन्धनक जे परिवर्त्तित स्वरूप देखि रहल छी से ‘पोरस’ नामक सिनेमा अयलाक बाद प्रचलित भेल, ई भाय-बहिनक पर्वक रूपमे मिथिलामे पसरि गेल।’ आनो-आन पोथीमे

बच्चीकेँ सेहो बान्हल  जाइ छल रक्षा-सूत्र 

श्रावणी पूर्णिमा दिन कुलदेवताकेँ रक्षा-सूत्र चढ़ाओल जानि आ पण्डित-पुरहित रक्षा-सूत्र लऽ घरसँ बिदा होथि आ यजमान सभक ओतऽ जा ‘येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल: तेन त्वां प्रतिबध्नामि रक्षे मा चल माचल:’ मंत्रक संग घर-परिवारक सभ सदस्यकेँ रक्षा-सूत्र बान्हथि। बच्चीकेँ सेहो राखी बान्हल जाइनि। पुरुषक दहिना हाथमे आ बच्ची लोकनिक वामा हाथमे पण्डित रक्षा-सूत्र (राखी) बान्हथि। यजमान पण्डितकेँ दक्षिणा देथि। कतहु-कतहु बूढ़-पुरान लोक सेहो अपनासँ कम उमेरक लोककेँ रक्षा-सूत्र बान्हथि। एक गोटेकेँ कतेको पण्डित सेहो बान्हथि। खास कऽ सुखी-सम्पन्न लोक रक्षा-सूत्र बन्हेबा लेल श्रावणी पूर्णिमाकेँ दलानपर बैसथि आ पण्डित-पुरहित आबि-आबि रक्षा-सूत्र बान्हि दक्षिणा पाबथि। पण्डित श्रीचन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’ अपन पोथी ‘अतीत मन्थन’ मे महाराज रमेश्वर सिंहक प्रसंग लिखै छथि- ‘श्रावणी पूर्णिमा दिन महाराजाधिराज रमेश्वर सिंह रक्षाबन्धन पर्वक अवसरपर पूर्ण राजकीय वेषमे वर्त्तमान संस्कृत विश्वविद्यालयक सभाकक्ष आनन्दबागमे बैसैत छलाह, आगाँमे तीन टा चानीक बट्टामे टाका, अठन्नी आ चौअन्नी राखल रहैत छलनि।
अपन कुल पुरोहित, विद्यालयक अध्यापक लोकनि, छात्रगण, राजक ब्राह्मण कर्मचारी सब, शुभंकरपुर, सुन्दरपुर, रानीपुर, खराजपुर, मिर्जापुर, चतरिया, गहुमी आदि गामक ब्राह्मण सब राखी बन्हबाक हेतु अबैत छलथिन।
 दक्षिणामे पुरोहित, अध्यापक लोकनिकेँ एक टाका, ब्राह्मण सबकेँ अठन्नी, छात्र समुदाय आ दरिद्र सबकेँ चौअन्नी भेटैत छलनि।’ राखीसँ सम्बन्धित लोकगीत उपलब्ध नञि होयब सेहो एहि भावकेँ पुष्ट करैत अछि जे ई पाबनि मिथिलामे भाइ-बहिनक नञि छल। हँ, आइ अछि आ लोक हँसी-खुशी पवित्र भावसँ मिथिलोमे मनबै छथि।

मेधा-रक्षाक ओरियान

पहिने मिथिलामे जे रक्षाबन्धन मनाओल जाइ छल ओहिमे मेधाक रक्षाक वचन लेल जाइ छल। पहिने जे समाजमे जातीय व्यवस्था छल से एखुनका जकाँ नञि छल। पहिने समाजक ब्राह्मण वर्गक काज छल पढ़ब-पढ़ायब आ समाज-कल्याण लेल चिन्तन   मनन करब। स्वाभाविक रूपसँ जे समाजक कल्याण लेल चिन्तन-मनन करै छला तकरा प्रति समाजोक दायित्व बनै छल। प्राय: तेँ पण्डित-पुरहित द्वारा श्रावणी पूर्णिमापर रक्षा-सूत्र बन्हबाक विधान कयल गेल जे एहि मेधाक रक्षाक वचन दैत समाज अपन दायित्वक निर्वाह सेहो करय। रक्षाबन्धनक मंत्रमे यैह कहलो जाइत अछि। आइ ई भाव कतहु नञि अछि। मेधाक रक्षाक चिन्ता एतेक गम्भीरताक संग करबाक व्यवस्था तिरोहित भऽ गेल अछि।

बदलैत स्वरूप झूस होइत भाव 

जेना-जेना युग बदलि रहल अछि, तहिना-तहिना राखीक स्वरूप सेहो बदलैत चलि गेल। पहिने एक पातर सूत्रक आगाँ तूरकेँ रंगि ओकर फुदना लगाओल राखी बनै छल। ई एखनो भेटैत अछि, मुदा बहुत तकबापर। जखन एकर ग्राहके नञि छथि तँ सभ तरि भेटत कोना? पहिने पटुआसँ सेहो ई बनाओल जाइ छल। एहि राखीक डोरमे बीच-बीचमे तूर अथवा पटुआकेँ विभिन्न रंगमे रंगि लगाओल रहै छल।
धीरे-धीरे पाबनिपर बजार आ प्रदर्शन हाबी होइत गेल। स्पञ्जक राखी बनऽ लागल। दू-तीने रंगक अथवा एके रंगक स्पञ्ज गोल रहै छल आ ओहिपर प्लास्टिक केर फूल, रक्षाबन्धन लिखल किंवा आन कोनो फोटो लागल रहै छल। कतेको गोटे ओहिपर सय-पचासक टाका लगा सेहो पहिरथि। फेर नग आदि राखी आयल। राखीक ई स्वरूप जेना-जेना बदलि रहल अछि तहिना-तहिना एकर पवित्र भाव सेहो झूस होइत जा रहल अछि। स्नेहपर प्रदर्शन आ बजार हाबी भऽ रहल अछि।

पेटी-बाकसमे  सेहो रक्षा सूत्र 

रक्षाबन्धनक संग लोक परम्परा सेहो जूटल। जन-सामान्यक मान्यता भऽ गेल जे ई रक्षा-सूत्र अछि आ ई जकरा बान्हल जायत तकर सुरक्षा होयत। एहि भावक आधारपर अपना ओहि ठाम मनुक्खे नञि निर्जीव वस्तु पर्यन्तकेँ रक्षा-सूत्र बन्हबाक परम्परा चलि पड़ल। लोक अपन घरक केबाड़क जिज्जिर, आब हेण्डिल, साइकिल, मोटरसाइकिल, पेटी, बाकस आदिमे रक्षा-सूत्र बान्हऽ लगला। अखनो कतहु-कतहु ई परम्परा चलि रहल अछि, मुदा आब हुकहुकीपर अछि। धीरे-धीरे ई समाप्ति दिस अग्रसर अछि।
स्वेच्छाचारितासँ भखरि रहल महत्व
पछिला किछु दशकसँ भारतीय पाबनि-तिहार मनेबामे स्वेच्छाचारिता निरन्तर बढ़ल जा रहल अछि। दुर्गापूजा हो वा रक्षाबन्धन, अधिकांश पाबनिक संग ई भऽ रहल अछि। कोनो देवी-देवताक मूर्त्ति स्थापित कऽ पूजा कयल जाइत अछि आ शास्त्रीय विधानकेँ कतिया मनमर्जी विसर्जन कयल जाइत अछि। तहिना रक्षाबन्धनक संग सेहो भऽ रहल अछि। कतिपय संस्था श्रावणी पूर्णिमासँ पहिने रक्षाबन्धन मना लैत अछि। तहिना पाबनि बीति जेबाक बादो ओकरा मनेबाक चलनि देखबामे अबैत अछि। मानल जा रहल अछि जे जानि-बूझि कऽ एना कयल जा रहल अछि जाहिसँ भारतीय परम्परा भखरि कऽ महत्वहीन भऽ जाय।

आउ मजगूत करी स्नेह-सूत्र 

रक्षाबन्धनक वर्त्तमान भने इतिहास कथा आ सिनेमाक देन हो, मुदा भाइ-बहिनक पवित्र प्रेमक रूपमे ई प्रतिष्ठित अछि। आउ एहि पाबनिकेँ एहिमे निहित रक्षाक पवित्र सन्देशक संग मनाबी। एखन जेना महिलामे माय-बहिनिक छवि देखबाक प्रवृत्ति समाप्त भऽ रहल अछि आ हुनका सभक संग मानवताकेँ लज्जित करऽवला घटना भऽ रहल छनि, ताहि समयमे एकर प्रासंगिता आरो बढ़ि गेल अछि। आउ पवित्र भावसँ मनाबी रक्षाबन्धन आ स्नेह-सूत्रकेँ
करी मजगूत।    

साभार :   -अमलेन्दु शेखर पाठक 

Wednesday, August 14, 2013

स्वाधीनता समरमे कलम-तरुआरि संग मिथिला

 
सांसारिक एवं आध्यात्मिक चेतनाक बीच अद्भुत सामञ्जस्य बनेनिहार महाराज विदेह जनकक मिथिला-भूमिक कोखिसँ जतऽ भगवती सीताक प्राकट्य भेल ओतहि अनेकश: विभूति भेला जे विद्या-वैभवक बलपर सम्पूर्ण विश्वमे अपन मातृभूमिक कीर्त्ति-पताका फहरेलनि। अपन विशिष्ट सांस्कृतिक परम्परा लेल बेछप परिचय स्थापित केनिहार मिथिला सदिखन शान्त मनसँ विद्या-व्यवसायमे लागल रहल। शब्द-ब्रह्मक संग शान्ति केर उपासना लेल मैथिल चर्चित रहला अछि। यैह यथार्थो अछि, मुदा एकर अर्थ ई कदापि नञि अछि जे मिथिलावासी डेरबूह रहला अछि। जखन कखनो बेर पड़ल मिथिलाक वीर-सपूत क्रान्ति-कालीक आराधनासँ कहियो डेग पाछाँ नञि केलनि। एहि ठामक तप:पूत आत्मबलिदान लेल प्रस्तुत रहला। हँ, समर-भूमि पर्यन्तमे अपन विवेक आ बुद्धिकेँ संग रखलनि। मिथिला जखन कखनो युद्ध लेल सन्नद्ध भेल अपन मेधोक उपयोग करैत रहल। क्रान्ति-पथपर बढ़ल तँ समवेत भऽ बढ़ल। वीर योद्धा लोकनि तँ मैदानमे अपन वीरताक प्रदर्शन लेल उतरबे केला, साहित्य-साधक लोकनि सेहो पाछाँ नञि रहला। समर-भूमिमे कलम आ तरुआरि एक संग अपन कमाल देखबैत रहल। भारतमाताक परतंत्रताक बेड़ी कटबा लेल सेहो मिथिला जखन समवेत भेल तँ एक दिस जतऽ अपन शोणितसँ राष्टÑ-देवताक चरण पखारबा लेल मैथिलक नम्मा पतियानी लागि गेल ओतहि साहित्यकार बन्धु सेहो अक्षर-अर्घ्य समर्पित केलनि। स्वतंत्रता-संग्रामक महायज्ञमे अपनाकेँ होमि देबा लेल उताहुल असंख्य मैथिल युवा जतऽ चन्द्रशेखर आजाद, सुभाष चन्द्र बोस, भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, खुदीराम बोस, प्रफुल्ल चाकी आदिकेँ अपन आदर्श मानि बलिदानीक शृंखलामे जुटि गेला, ओतहि महात्मा गान्धीक अहिंसा आ असहयोग आन्दोलनक संग सेहो सम्पूर्ण समाज जुटि गेल। ओहि समय जेना मिथिलाक घर-घर आन्दोलनीक गढ़ बनि गेल। एक दिस युवा लोकनि रेल लाइन उखाड़बामे जुटला तँ टेलीफोनक तार काटल गेल, सड़क-पुल तोड़ल गेल, कोर्ट-कचहरीमे ताला लगायल गेल। डाकघर लूटल गेल आ अंगरेजी सरकारक अन्य सम्पत्तिकेँ व्यापक क्षति पहुँचायल गेल। एहि क्रममे कतेको ठाम गोली चलल आ सैकड़ो गोटे एहिमे मारल गेला। जखन 1857 केर विद्रोह भेल तँ ओ मिथिलामे देवघरक समीप रोहिणी गामसँ आरम्भ भेल जतऽ 12 जून 1957 केँ ओहि ठामक रेजीमेण्टक तीन सिपाही विद्रोह करैत लेफ्टिनेण्ट सर नारमन लेस्लीक गोली मारि हत्या कऽ देलनि। तीनूकेँ फाँसीक सजाय भेटलनि। एकर बाद भागलपुरक संग मिथिलाक आन-आन क्षेत्रमे विद्रोहक आगि पसरैत गेल आ मिथिलाक सपूत लोकनिक बीच जेना अपन जीवन-धन अर्पित करबाक प्रतिस्पर्द्धा आरम्भ भऽ गेल। एहि क्रममे बड़गामक रामदयाल सिंह, मुधोरापुरक छुट्टो उर्फ झगड़ू आदि फाँसीक फान चुमलनि तँ बड़गामक कदई साही, छोटू साही, कृष्णा साही, दर्शन शाही आदि कालापानीक सजाय पेलनि। एकर अतिरिक्त नत्थू शाही, शोभा शाही, बैजनाथ तिवारी, कित्तू शाही, छत्रधारी शाही तिलकू तिवारी आदि सेहो जहलक सजाय भोगलनि। ई मिथिलाक कोनो एक क्षेत्रक कथा नञि अछि। आन्दोलनीक ई पतियानी नम्मा होइत चलि गेल।
दरभंगाक पं. रामनन्दन मिश्र, डॉ. लक्ष्मण झा, जयनारायण झा विनीत, यदुनन्दन शर्मा, सूरज नारायण सिंह, हरिपुर गामक बलिदानी बालक द्वय शिव आ नारायण, कमलेश्वरी चरण सिन्हा, गोष्टो बनर्जी, दीनानाथ सिंह, जगदीश्वरी प्रसाद ओझा, ब्रजकिशोर प्रसाद, धरनीधर प्रसाद, रामनिहोरा सिंह, कुलानन्द वैदिक, डॉ. डी. एन. झा, गोपी बल्लभ दास, ब्रज बल्लभ दास, ओकील सुरेन्द्र प्रसाद, राजेन्द्र प्रसाद, राधिका प्रसाद, राजपति लाल, भरफोड़ीक रक्षा सिंह, नेउरक अवध सिंह आ राज प्रसाद सिंह आदि स्वाधीनता-समरमे अपनाकेँ झोँकि देलनि। स्वाधीनता आन्दोलनमे दरभंगा राज परिवारक अहम भूमिका रहल। राज परिवार आरम्भेसँ स्वाधीनता सेनानीकेँ सहयोग दैत रहला। बेर पड़ल तँ खुजि कऽ सेहो सामने आयल आ तत्कालीन काँग्रेसकेँ अधिवेशन लेल इलाहाबादमे भवन कीनि कऽ समर्पित कऽ देलक। दरभंगाकेँ महात्मा गान्धी, सुभाष चन्द्र बोस आदिक प्रत्यक्ष मार्ग-दर्शन भेटैत रहल जे पाथेय बनल।

नेशनल स्कूल भरलक नव ऊर्जा 

स्वतंत्रता आन्दोलनकेँ नेशनल स्कूलक स्थापना नव ऊर्जासँ भरलक। दरभंगामे एकर स्थापना 1920 इ. मे भेल। ई स्थापित भेल छल सरकारी स्कूलकेँ त्यागनिहार छात्र लोकनिकेँ पढ़ेबा लेल, मुदा बादमे ई आन्दोलनीक गढ़ बनि गेल। ई नेपालक पूर्व प्रधानमंत्री मातृका प्रसाद कोइराला आ वी. पी. कोइरालाक संग ओहि समयक प्राय: सभ आन्दोलनीक आश्रयस्थल बनल। ई आपात कालमे समाजक चिन्तो करैत रहल, ओतहि बेर-विपतिमे ठाढ़ो होइत रहल। एहि ठाम 1932 केर 26 जनवरीकेँ राष्टÑीय ध्वज फहरेबाक घटना ककरा रक्तकेँ ओजसँ नञि भरि देत। ओहि दिन भीड़ जमा छल आ राष्टÑीय ध्वज फरायल जा रहल छल। तखने अंगरेजी सिपाही पहुँचि गेल आ कार्यक्रम स्थगित करबा लेल कहलक, मुदा आन्दोलनी नञि मानलनि। लाठी चार्ज भेल, मुदा 12 बरखक छात्र युगेश्वर प्रसाद सहित कतेको आन्दोलनी डटल रहला। एहिमे कतेको गोटे घायल भेल छला। मधुबनीमे चतुरनान दास आ समस्तीपुरक दलसिंहसरायमे वंशीधर मारवाड़ी नेशनल स्कूलक स्थापनाकेँ साकार केलनि। एकर अतिरिक्त हाजीपुर, सीतामढ़ी, बेतिया, मेहसी, भागलपुर, कटिहार, नसरगञ्जमे सेहो नेशनल स्कूल स्थापित भेल आ आन्दोलनक चिनगीकेँ प्रचण्ड ज्वाला बनबैत रहल।
मधुबनी : जयनगर थानाक घेराव कालमे छपराही गामक   लखन यादवक बलिदान भेलनि। डॉ. बैद्यनाथ मिश्र बेनीपट्टी थाना आ डाकघरमे आगि लगेलनि आ एहि क्रममे मुइला। ओतहि भोगेन्द्र झा, रामाकान्त झा, फखरू महतो, गणेशी ठाकुर, अकलू महतो लाइन उखबड़बा काल अंगरेजक गोलीसँ मुइला। एहिमे नथुनी साह गोलीक छर्रासँ घायल भेला। रामलखन मिश्र, बेनीपट्टीक डॉ. बैद्यनाथ झा, ठक्कन महतो आदि

 नेपालक जहल तोड़लक आजाद दस्ता 

स्वाधीनता आन्दोलनमे समस्तीपुरक ओकील गिरिवर प्रसाद, सत्यनारायण सिंह, कर्पूरी ठाकुर, यदुनन्दन सहाय, डॉ. देवकीनन्द झा, डॉ. शालिग्राम मिश्र, रघुनाथ प्रसाद सिंह, सत्यनारायण तिवारी, रामखेलावन भगत, यमुना सिंह, रामनिरीक्षण सिंह, रामदेव सिंह, रमानन्द ब्रह्मचारी, देवनारायण मण्डल, जागेश्वर पूर्वे, अवध बिहारी सिंह, विश्वनाथ सिंह, जागेश्वर महतो, उमानाथ शर्मा, हरिनन्दन ठाकुर प्रसाद शर्मा, महावीर सिंह, सियाशरण सिंह, वशिष्ठ नारायण सिंह, मुनीन्द्र शर्मा, डॉ. रामप्रकाश शर्मा, नन्दलाल शर्मा, विलायत सिंह, यमुना कार्यी, सुनीति देवी, मो. शीश, मुंशी मेहतर, रत्नेश्वरी प्रसाद सिंह, लक्ष्मण सिंह, रामचन्द्र प्रसाद सिंह, रामलखन प्रसाद सिंह, गया प्रसाद सिंह, लक्ष्मीनारायण राय, राम औतार सिंह, कमलनाथ ठाकुर, युगल कुँवर, डॉ. मुक्तेश्वर सिंह उर्फ मुक्खा सहनी, शत्रुघ्न शरण सिंह, महेन्द्र नारायण सिंह, शौकत अली आजाद, डॉ. वी. डी. शर्मा आदि स्वतंत्रता आन्दोलनमे तन-मन-धनसँ लागल रहला। एहि ठाम नन्द किशोर शर्मा निर्भय आ कर्पूरी ठाकुर 1939 सँ पूर्व व्यक्तिगत सत्याग्रह आरम्भ हेबासँ पहिने राज्य छात्र संघक अधिवेशन करेलनि। निर्भयजीकेँ विरोधमे भाषण करबापर एक बरखक सजाय भेल छलनि। ओमहर छात्र सभ थानापर तिरंगा फहरेलनि। बादमे रामचन्द्र सिंह, एकबाल सिंह, माधव सिंह, उमाकान्त सिंह, जगदीश पोद्दार आ चन्द्र प्रकाश गिरफ्तार भेला। केईएचई स्कूलक छात्र रमाकान्त झा रोसड़ा टीसनपर झण्डा फहरेलनि। सिंघिया थानापर झण्डा फहरेनिहार कुलदीप सिंहकेँ गोली मारि देल गेल। दलसिंहसराय थानापर झण्डा फहरेबा काल गोली चलल जाहिमे कतेको मरला आ घायल भेला। 15 अगस्त 1942 केँ ब्रिटिश सेनासँ भरल ट्रेन मुजफ्फरपुर जा रहल छल, ओहिमेसँ मशीनगनसँ जूलूसपर गोली दागल गेल जाहिमे केईएचई स्कूलक नवम कक्षाक छात्र रामलखन राय शहीद भेला। अगस्त क्रान्ति भर्त्सनापर  एसडीओ जबर्दस्ती छात्र-अभिभावक केर हस्ताक्षर लेलक। केईएचई स्कूल खूजल तँ छात्र सभ ओहि बण्डलकेँ जरेलनि। एहिमे छात्र धनेश्वर साह, शारदानन्द झा, बलभद्र नारायण सिंह, राजेन्द्र नारायण शर्मा आ कृष्ण चन्द्र प्रसाद सिंह राधेजी अभियुक्त बनायल गेला आ केस भेल। एहि ठाम आजाद दस्ता गठित भेल। ई हनुमाननगर (नेपाल) जहल तोड़ि जयप्रकाश नारायण आ डॉ. राममनोहर लोहिया आदिकेँ छोड़ेलक। एहि दस्तामे शारदानन्द झा, वशिष्ठ नारायण सिंह, भोला साह, हरेकृष्ण राय, बलदेव चौधरी, बालेश्वर प्रसाद सिंह, कर्पूरी ठाकुर, रामऔतार शर्मा, रघुनाथ प्रसाद सिंह, राजेन्द्र नारायण शर्मा, जगदीश पोद्दार, रामबुझावन सिंह आदि छला। वशिष्ठ नारायण सिंह दरभंगा जहल फानि बहरेला जाहिमे दरभंगा समाहरणालय केर लिपिक राम सरोवर शर्मा आ कृष्णचन्द्र राधे सहयोगी भेला। हिनका लोकनिक अतिरिक्त राम बुझावन सिंह, बाबूजी पाठक, ठक्कन चौधरी, राजेन्द्र नारायण शर्मा आदि निरन्तर आन्दोलनात्मक गतिविधि चलबैत रहला।

खलबला उठल कोसी 
आ पवित्र गंगा 
भारत राष्टÑकेँ अंगरेजक दासतासँ मुक्त करेबामे गण्डकी, कमला, बलानक संग कोसीक पानि सेहो खौलि उठल। सहरसा, मधेपुरा, सुपौलक संग गंगाक किनारपर बसल मुंगेर आ भागलपुर सेहो अपनाकेँ एहि आन्दोलनमे पूरापूरी समर्पित कऽ देलक। कोसी क्षेत्रक  बाबू रामबहादुर सिंह, पं. छेदी झा, बाबू लक्ष्मी सिंह, जटाशंकर चौधरी, पं. सूयनर््ाारायण झा आदिक नाम स्वर्णाक्षरमे अंकित अछि। एकाढ़ गामक धीरो राय केर मृत्यु भागलपुर जहलमे भेलनि।
मधेपुराक चुल्हाइ यादव भागलपुर जहलमे मुइला। गढ़िया-बलहा गामक कालेश्वर मण्डल सहरसामे गोलीसँ मारल गेला। एही गामक नीरो मण्डल, नूनूलाल मण्डल, पं. बलभद्र मिश्र, रमेश झा, गणेश झा, महादेव मण्डल, शोभाकान्त मिश्र, बनगामक हरिकान्त एवं पुलकित कामति सहरसा टीसनपर अंग्रेजक गोलीसँ मारल गेला। चैनपुरक भोला ठाकुरकेँ सहरसा गोशाला लग गोली मारि देल गेलनि। नरियार गामक केदारनाथ तिवारी, उदाकिशुनगञ्जक बाजा साह, बलुआ बजारक प. राजेन्द्र मिश्र, ललित नारायण मिश्र, गढ़ियाक रमेश झा, पचगछियाक बाबू रामबहादुर सिंह, बनगामक पं. छेदी झा द्विजवर, रानीपट्टी गामक शिवनन्दन प्रसाद मण्डल, परसरमा गामक गंगा प्रसाद सिंह, मधेपुराक मो. कुदरुतुल्ला, बैद्यनाथधर मजुमदार उर्फ खोखाबाबू,  बिहराक रतिलाल मिश्र, सहरसा सुलिन्दाबादक चित्रनारायण शर्मा, परड़ीक सूर्यनारायण झा, सुपौलक कर्णपुर केर चन्द्रकिशोर पाठक, पटोरी पचगछियाक राजेन्द्र लाल दास, जटाशंकर चौधरी, गणतगञ्जक खूबलाल महतो आ हिनक पत्नी लक्ष्मी देवी आदिक अवदानकेँ कहियो नञि बिसरल जा सकैत अछि। विदेशी वस्त्र जरेबामे आ दोकानपर पिकेटिंग केनिहारमे रामफल सिंह, सोनाइ मण्डल, बोतल हजरा, ईश्वर मण्डल, जोहर मण्डल, झण्डा फहरेनिहारमे हंसराज पैकरा, सिताइ सन्त, अशर्फी साह, रामप्रसाद मण्डल, रामेश्वर झा, अशर्फी मेहता, मनोहरपट्टी गामक कामता प्रसाद, भूषण प्रसाद गुप्ता, भुवनेश्वर प्रसाद वर्मा, लक्ष्मण लाल दास, जनेश्वर   ठाकुर, विश्वनाथ प्रसाद सिंह, बैकुण्ठ प्रसाद सिंह, शालिग्राम प्रसाद सिंह, जयबल्लभ सिंह, सियाराम, चतुरानन्द मिश्र, गणेशपुर गामक श्रीकान्त मिश्र, विद्याधर झा, कोरियापट्टीक विश्वनाथ प्रसाद सिंह, बैकुण्ठ प्रसाद सिंह, परसारीक किन्नू यादव, वाजितपुरक उग्रनारायण सिंह, जदियाक भब्बी यादव, बभनगामाक विश्वनाथ झा, सुशासन गामक कमलेश्वरी मण्डल, मुरलीगञ्जक वेणी प्रसाद मण्डल, अमीरमल चम्पा लाल, सोहनलाल बैद्य, गंगापुरक सत्यनारायण मण्डल, मधेपुरा सरोपट्टीक कार्त्तिक प्रसाद सिंह, भेलाहीक सृष्टि नारायण यादव आदि स्वाधीनता सेनानी मातृभूमिकेँ अंगरेजक चाङुरसँ मुक्त करेबामे दिन-राति एक केने रहला। तिलकपुर गामक सियाराम सिंहक नेतृत्वमे सियाराम दल गठित भेल। सोनवर्षामे सियाराम दल आ पुलिसमे संघर्ष भेल। एहिमे सरदार नित्यानन्द सिंह, भागलपुर खरहियाक अर्जुन सिंह, बिहपुर झण्डापुरक फौदी मण्डल, सोनवर्षाक लड्डू शर्मा, कालूचक विसपुरिया कालूचक केर रामावतार झा, सोनवर्षाक सीताराम मण्डल आ खुशरू मण्डल तथा खरिक कठैलाक निर्मल झा मारल गेला।
एकर नेतृत्वकर्त्ता पार्थ ब्रह्मचारी, चिन्तामणि मिश्र, रामखेलावन सिंह, रामावतार राय आदि दलमे छला। एहि ठाम परशुराम दल आ महेन्द्र गोपक दल सेहो सक्रिय छल। एकर अतिरिक्त भागलपुरक केशवदास चौधरी, सीतामढ़ीक बाबू नवाब सिंह, यमुना सिंह, पूर्णिञाक लक्ष्मीनारायण सुधांशु, लेफ्टिनेण्ट केदारनाथ चौधरी, रवि रञ्जन बाबू, कन्हैया लाल, कटिहारक सत्यदेव शुक्ल, खगड़ियाक माड़र गामक बलिदानी प्रभु नारायण आ धन्ना-माधव, आदि स्वतंत्रता-संग्राममे जुटल रहला। मुजफ्फरपुर तँ जेना आन्दोलनीक गढ़े छल। नरम बा गरम दुहू दलक ई केन्द्र जकाँ छल। खुदीराम बोस आ प्रफुल्ल चाकी किंग्स फोर्ड केर हत्या लेल ओकरा वाहनपर जखन बम फेकलनि तँ युवक नव उछाहसँ भरि उठला।
ओना एहि घटनामे फोर्ड बचि गेल आ दू गोट महिला मारल गेली, तथापि बम काण्ड खुदीरामकेँ युवा-हृदय सम्राट बना देलक। समस्तीपुरक ओइनीमे हुनक पकड़ल जायब आ फाँसीपर चढ़ा देल जायब आन्दोलनीक संकल्पकेँ आरो मजगूत केलक। मुजफ्फरपुरक राय बहादुर द्वारिकानाथ, रामप्रसाद, रामनारायण तिवारी, अयोध्या सिंह, महंथ रामकृष्ण दास, रामप्रीत पाण्डेय, केदार सिंह, ध्वजा बाबू आदि स्वाधीन भारतक सपना साकार करबा लेल कण्टकाकीर्ण पथकेँ अंगीकार केलनि। तत्कालीन मुजफ्फरपुरक नगरपालिका अध्यक्ष खाँ बहादुर महबूब हुसैन आदिक सक्रियता इतिहास रचलक।  

गान्धीजीकेँ ‘महात्मा’ केर उपाधि अर्पित केलक मिथिला 


स्वाधीनता समरमे महात्मा गान्धीक अवदानक समक्ष सम्पूर्ण राष्टÑ नतमस्तक अछि। गान्धीजीक सफलतामे मिथिलाक बड़ बेसी योगदान रहल। ओ मिथिलामे अपन आन्दोलनक सूत्रपात मोतिहारीसँ केलनि आ तकर बाद हुनका संग जन समुद्र उमड़ि गेल। गान्धीजी मिथिलामे स्वतंत्रता आन्दोलनक बहि रहल बसातकेँ अन्हर-बिहाड़िमे बदलि देलनि। एकर बाद समग्र मिथिला असहयोग आन्दोलन, नोन सत्याग्रह आदिमे जूटि गेल। हुनक एहि अवदानकेँ मिथिला गम्भीरतासँ लेलक आ हुनका ‘महात्मा’ उपाधिसँ विभूषित केलक। हालेमे मैथिलीमे प्रकाशित गान्धीजीक पोथी ‘मंगल प्रभात’ केर अनुवाद पोथीमे डॉ. रामदेव झा एहि तथ्यकेँ उद्घाटित केलनि अछि। ओ 21 अप्रील 1917 सँ लऽ 24 नवम्बर 1917 केर बीच तत्कालीन प्रसिद्ध पत्रिका ‘मिथिला मिहिर’ मे गान्धीजीक आन्दोलनसँ सम्बन्धित आठ गोट समाचारक शीर्षक केर उल्लेख केलनि अछि जाहिमे गान्धीजीकेँ ‘महात्मा गान्धी’, ‘महात्मा कर्मवीर गान्धी’ कहल गेलनि। डॉ. रामदेव झाक मानब छनि जे गान्धीजीकेँ 21 अप्रील 1917 सँ पूर्व ‘महात्मा गान्धी’ कहल गेल होनि एहन प्रमाण नञि भेटैत अछि जे स्पष्ट करैत अछि जे गान्धीजीकेँ ‘महात्मा’ उपाधि मिथिला अर्पित केलकनि। चम्पारणक भूमि स्वाधीनता आन्दोलनक दृष्टिञे बड़ उर्वर रहल अछि। एहि ठामक राजकुमार शुक्ल, गोरख प्रसाद, रघुनाथ लाल, प्रजापति मिश्र, रामकुमार मिश्र, पवन कुमार मिश्र, खेम्हर राय, रामजी साह, प्यारेलालजी, काली कुमार मिश्र, ध्रुव नारायण त्रिपाठी, कमलनाथ तिवारी, विभूति मिश्र, विपिन बिहारी वर्मा, गणेश राय, राजाजी झा, लक्ष्मी नारायण झा, वंशी राउत, गुलाली, हरेकृष्ण झा, राजा ओझा, पशुपतिनाथ झा आदि आन्दोलनक ज्वालामे अपनाकेँ समर्पित कऽ इतिहास रचलनि।

लेखनी उगिलैत रहल आगि 

स्वतंत्रता आन्दोलनमे साहित्यकार लोकनिक लेखनी आगि उगिलैत रहल। आधुनिक मैथिली साहित्यक जनक कवीश्वर चन्दा झा ‘समय केहन भेल घोर हे शिव’, ‘न्यायक भवन कचहरी नाम, सभ अन्याय भरल तेहि ठाम’, साहित्यरत्नाकर मुंसी रघुनन्दन दास अपन कविता ‘देश दशा’, यदुनाथ झा यदुवर ‘भारत सुषमा’, ‘कामना’, पं. छेदी झा मधुप ‘चरखा चौमासा’, ‘जयति स्वदेश’, कविवर सीतराम झा ‘स्वदेश महिमा’ आदिसँ समाजकेँ स्वतंत्रता लेल चलि रहल आन्दोलनसँ जुटबाक प्रेरणा देबाक संग एहिमे लागल सेनानीक उत्साहवर्द्धन करैत रहला। ओमहर पं. रामनन्दन मिश्र मगन आश्रमसँ पत्रिका प्रकाशित कऽ अक्षर-आन्दोलन चलबैत रहला। कतेको जिलासँ विद्रोही पत्रिका प्रकाशित होइत रहल।
मिथिलाक स्वतंत्रता आन्दोलनक ई झलकी मात्र अछि। असंख्य लोक बलिदानी भेला। आइ हमरा लोकनि 67म स्वतंत्रता दिवस मना रहल छी। एहि सभ आत्मबलिदानी वीर-सपूतकेँ शत-शत नमन करैत एक बेर एहू दिस विचार आवश्यक जे की आइ देशक जे परिस्थिति अछि ताही लेल ई सभ अपनाकेँ होमि देलनि? की अंगरेजक दासतासँ मुक्त   भारत एहि सभ रणवीरक आकांक्षा-अभिलाषाक पूर्त्ति कऽ रहल अछि? की हमरा लोकनि अपन अवदानसँ हिनका सभक तर्पण करब?

साभार : अमलेंदु शेखर पाठक के इ लेख "मिथिला आवाज" मैथिली दैनिक समाचार पत्र केर 15 अगस्त केर अंक में प्रकाशित अछि.