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Thursday, August 1, 2013

सौराठ सभा : स्वर्णिम अतीत भखरैत वर्त्तमान -अमलेन्दु शेखर पाठक

सौराठ सभा गजगज करै छल। चारू भर पागे-पाग। लाल पाग। कोकटी पाग। उजरा पाग। वरक माथपर लाल, अधवयसूक कोकटी बूढ़क माथपर उजरा पाग। छत्ते-छत्ता। शिव मन्दिरमे दिन भरि बजैत घण्टा। योग्य वर-कन्याक मनोकमना पूर्त्ति लेल शिवलिंगपर चढ़ैत जनउ केर पथार। चाह-पान-जलपानक सजल दोकान-दौरी। सभा परिसरमे दरी, सतरञ्जी कि चद्दरि ओछा बैसल वरागत। हुनकासँ गप्प करैत कन्यागत। पिठारक उजरा चाननपर सिन्दूरक ठोप, लाल धोती लाले पाग पहिरने, आँखिमे काजर केने बैसल वरसँ हुनक योग्यता आदिक जानकारी लऽ सन्तुष्ट होइत लोक। वरपक्ष कन्यापक्षक बीच सामञ्जस्य बनबैत एक-दोसरा लेल योग्य सम्बन्ध देखबैत घटकराज। मिथिलाक्षरमे लिखल पञ्जीक पोथासँ अधिकार देखैत  
उतेढ़ पढ़ैत पञ्जीकार। प्रतिदिन उपस्थित हजारोक संख्या टपि कऽ होइत लाख-सवा लाख होइत। एते लोकक परस्पर वार्त्तालापक स्वर दूर-दूर धरि पसरैत। सभा आयल सर-सम्बन्धी लेल लगपासक गाममे घरे-घर तरुआ-तीमन छनाइत, पकमान बनैत। कुल मिला चारू भरक समग्र वातावरण उत्सवी रंगमे रङल।
उपर्युक्त पाँती पढ़ि कोनो मिथिलावासीक मन गदगद भऽ उठत। लागत
जे मिथिलावासी अपन एहि समृद्ध परम्पराकेँ कते सहेजि कऽ रखने छथि, मुदा फ्लैश बैकअछि। आइसँ लगभग पाँच दशक पूर्व धरिक स्थिति अछि। वर्त्तमान सर्वथा भिन्न अछि। अपनाकेँ हीन दोसराकेँ श्रेष्ठ मानबाक मानसिकता मिथिलाक एहि गौरवशाली परम्पराकेँ गीड़ि रहल अछि। आइ पाग नजरि अबैत अछि, मुदा आङुरपर गनबो जोगर नञि। जाहि सभामे दर्जनो पञ्जीकार बैसै छला ताहि ठाम मात्र चारि गोटे भेटै छथि। घटकराज एको गोटे नञि। वर सभ साल अबै छथि, मुदा एक-दू गोटे मात्र। तनिको तते उल्लू-दुत्थू होइ छनि जे एबापर पछताइत रहै छथि संग आयल लोक कान ऐँठै छथि जे आगाँ किनको नञि लऽ कऽ आयब।  जाहि वैवाहिक सभाकेँ मिथिला नरेश महाराज हरिसिंह देव आइसँ लगभग 700 बरख पहिने 1326 . केर लगपासमे शुरू केने छला ताहिसँ हमरा लोकनिकेँ तेहन अरुचि भेल, एकर ततेक खिधांस कयल, अपन परम्पराकेँ लतिया आधुनिकताक बिहाड़िमे तेना ने उधिआय लगलहुँ जे ठोहि पाड़ि कनबा लेल विवश अछि। अपन अन्तिम साँस गनि रहल अछि। तहिया जहिया यातायात सञ्चार केर कोनो सुविधा नञि छल तहिया मिथिलाक धमनीमे एक रंग सांस्कृतिक चिन्तनक रक्त प्रवाहित छल। आइ जखन सभ तरहेँ हमरा लोकनि सम्पन्न छी सञ्चार यातायातक आधुनिक सुविधा उपलब्ध अछि तँ हमरा लोकनि अपन गौरवाशाली सांस्कृतिक परम्पराक जड़ि काटि रहल छी। हमर जे परम्परा विश्वकेँ आकर्षित केलक, कऽ रहल अछि एकर अनुकरणमे नव ढंगेँ सामूहिक विवाह आदि भऽ रहल अछि तकरा हमरा लोकनि त्यागि चुकल छी।
मन पड़ैत अछि एकगोट सूनल कथा। कहाँ दन एकगोट भारतीय नेता विदेश गेला। ओहि ठामनैकेट क्लबसँ हुनका आमंत्रण भेटलनि। ओकर सदस्य क्लबमे नङटे रहै छला। से ओकरा सभसँ आमंत्रण पाबि नेताजी क्लब लेल बिदा भेला। बाटमे सोचलनि जे किए ने ओकरे सभ जकाँ उपस्थित होइ। ओकरा सभकेँ लगतै जे आधुनिक हेबामे भारत ओकरा सभसँ कनेको कम नञि अछि। बस फेर की छल, नेताजीक कार क्लब लग रूकल तँ अपन सभटा वस्त्र फोलि नङटे बहरेला, मुदा ओहि ठाम स्थिति एकदम विपरीत छल। क्लबक सदस्य सभ
विचारने छला जे भारत कते विकसित देश अछि जे ओहि ठाम तेहन वस्त्र पहिरल जाइत अछि जे ओकरानैकेट क्लबकेर प्रयोजने नञि छै। हमरा लोकनि ने भरि दिन नीचासँ ऊपर टाइट वस्त्र पहिरै छी जे थोड़े काल वस्त्र विहीन रहब स्वास्थ्यकर होइत अछि। किए ने भारतीय नेताक स्वागत भारतीय परिधानमे करी। से नेताजी जखन कारसँ बहरेला तँ हुनका स्वागतमे विदेशी सभ धोती-कुर्त्ता पहिरने चारू कात ठाढ़ छला नेताजी बीचमे नाङट। ठीक एहने स्थिति हमरा सभक भऽ गेल अछि। जाहि वैवाहिक सभाकेँ लऽ मिथिलावासी समग्र संसारमे विशिष्ट मानल जाइत रहला अछि, आइयो मानल जाइ छथि, तकर हमरा लोकनि गर्दनि रेति रहल छी। एखनो सभावास सभ साल होइत अछि। मधुबनी जिलाक सौराठमे सभा लगैत अछि, मुदा उसरल-उसरल सन। जाहि सभाक प्रसंग कहल जाइ छल जे सवा लाख लोक जुटबापर ओहि ठामक पीपड़क गाछक सभ पात मौला जाइ छल, पात मौलाइते लोक बूझि जाइ छल जे सभामे एक लाखसँ बेसी लोक जुटि गेला, से सभा आइ स्वयं मौला रहल अछि।

देश-विदेशसँ होइ छल जुटान

पहिने सौराठ सभामे मिथिलाक सभ जिला पूर्णिञा, खगड़िया, बेगूसराय, सहरसा, सुपौल, मधेपुरा, समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर, हाजीपुर, देवघर, भागलपुर, मुंगेर, कटिहार, मधुबनी, दरभंगाक संग नेपालक मिथिला क्षेत्रसँ तँ लोक जुटिते छला, मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, महाराष्टÑ आदि राज्यक भोपाल, रायपुर, जयपुर, मालदह, वाराणसी आदिसँ सेहो मैथिल अबै छला। कही जे देश भरिसँ जुटै छला। देशे की विदेशोसँ अबै छला सभामे अपन कन्या, बहिन, भतीजी आदि लेल योग्य वर चुनै छला। कन्या पक्षकेँ योग्य वर वर पक्षकेँ अपना योग्य कन्या भेटि जाइ छलनि।

कतेको ठाम लगै छल सभा

पहिने मिथिलामे सौराठक अतिरिक्त सीतामढ़ीक ससौला, झञ्झारपुरक समीप परतापुर, दरभंगाक सझुआर, सहरसाक महिषी पूर्णिञाक सिंहासनमे   सेहो सभा लगै छल। जेना-जेना मैथिल आधुनिक होइत गेला सभा सभ उसरैत गेल। बाँचि गेल मात्र सौराठ सभा। ईहो उसरि रहल अछि। कतेको गोटे कहै छथि जे एहूसँ बेसी ठाम सभा होइ छल विभिन्न जातिक लेल होइ छल जे समटा कऽ मैथिल ब्राह्मण कर्ण कायस्थ मात्र लेल रहि गेल।

अपवादे होइ छल घर कथा

पहिने अपवादे स्वरूप वर्त्तमान जकाँ घर-कथा होइ छल। सभटा कथा सभेसँ होइ छल। एकर बहुत रास लाभ छल। सभसँ पैघ आर्थिक लाभ छल। आइ जते कथा होइत अछि ताहिमे वर तकबापर जते खर्च भऽ जाइ छल ततेमे कतेको गोटेक बेटीक विवाह भऽ सकैछ। एकरा संग समय केर बचत सेहो छल। एहि लेल गामे-गामे बौआय नञि पड़ै छल। तय छल जे सभामे बालक भेटिए जेता। एके ठाम सभ तरहक बालक। एहिमे जे पसिन्न भऽ जाय। एक बरख नञि भेल तँ अगिला बरख सही। एहन नञि होइ छल जे सभा गेनिहारकेँ बौआय पड़ै छलनि। वरो पक्षक लेल सुअवसर छल जाहिसँ आइ हमरा लोकनि पूर्णत: वञ्चित भऽ रहल छी।

अद्वितीय वैज्ञानिक अवधारणा पञ्जी

सौराठ सभा पञ्जी केर वैज्ञानिक अवधारणापर केन्द्रित रहल अछि। जे तथ्य आधुनिक विज्ञान आइ बूझि रहल अछि तकरा मिथिला आइसँ 700 साल पहिने ने मात्र बूझि गेल छल अपितु एकरा जाँचि-परखि लागू सेहो केलक। आधुनिक विज्ञान मानैत अछि जे निकट रक्त-सम्बन्धीक बीच वैवाहिक सम्बन्धसँ बहुत रास विकार अबैत अछि। ओतहि एकरा बारि देबापर होबऽ वला सन्तान तीक्ष्ण बुद्धिक तँ होइते अछि ओकरामे अपन माता-पिताक गुण पक्ष बेसी अबैत अछि। कतेको अनुसन्धान एहि चिन्तनपर मोहर लगेलक अछि। एही तथ्यकेँ ध्यानमे राखि पञ्जीकार माता पिता पक्ष दिससँ देखि विवाहक स्वीकृति दै छथि जे कतहु कोनो पीढ़ीमे रक्त सम्बन्धक निकटता तँ ने अछि। पञ्जीकार विश्वमोहन मिश्र कहै छथि जे ओना तँ मातृ पितृ पक्ष दुनू दिससँ 32-32 पीढ़ीक उतेढ़ पढ़ल जाइत अछि जे एहिमे रक्तक निकटता तँ ने अछि, मुदा पितृ पक्षसँ सात मातृ पक्षसँ पाँच पीढ़ीमे कतहु एके कुल-मूल केर नञि होयब अनिवार्य अछि। काज कहियो जरैल, पिलखवाड़, ननौर, कछुआ चकौती, कोइलख आदिक पञ्जीकार एहि ठाम करै छला। आइ मात्र चारि गोटे भेटै छथि।

सामाजिक सरोकारकेँ भेटै छल मजगूती

सौराठ सभा समग्र मिथिलाकेँ समवेत हेबाक अवसर दै छल। मिथिलाक विभिन्न जिलाक लोक एकठाम जुटै छला जाहि अवसरसँ हमरा लोकनि चूकि रहल छी। सभाक यैह गुण ओहू मिथिलावासीकेँ आकर्षित करै छल जिनका कोनो कथा करबाक नञि रहै छलनि, मुदा एहिमे जुटै छला। कनेको सजग मैथिल एहिमे अवश्य पहुँचथि जाबत सभा समाप्त नञि होइ छल ताबत की तँ अबै-जाइ छला अथवा लगपासक अपन सर-सम्बन्धी ओतऽ टिकै छला जे सामाजिक सरोकारकेँ आरो मजगूत करै छल। ककरो कन्या किंवा वरक कथा तय करेबामे भूमिका निमाहबासँ सेहो सामाजिक सरोकार अपन मूल अर्थमे बनल रहै छल। आइ हमरा लोकनि एहिसँ पूरापूरी वञ्चित भऽ रहल छी।

सभा उसरबाक मूल कारण काटर प्रथा मीडिया

एतेक समृद्ध परम्पराक धारा सुखा जेबाक मूलमे मिथिलावासीक परम्राक मोह छोड़ि देब तँ कारण रहबे कयल, संगहि काटर प्रथा (दहेज प्रथा) सेहो एकरा समाप्त करबामे अपन भूमिका निमाहलक। विद्याक बलपर समग्र विश्वमे अपन कीर्त्ति-पताका फरेनिहार मिथिला कहिया अर्थक पाछाँ नञि बौआयल। सभ दिन टाका-पाइसँ बेसी महत्व विद्या अपन संस्कृतिकेँ देलक। जेना-जेना हमरा लोकनिकेँ आधुनिकताक बसात लागल तेना-तेना हमरा लोकनि धनकेँ महत्व दैत गेलहुँ यैह परिवर्त्तित मानसिकता काटर प्रथाकेँ सभोमे सन्हिएलक। पुरान लोकक अनुसार वर पक्ष जुटै तँ छला, मुदा कुल-मूलसँ बेसी हुनक ध्यान कन्यागत लोकनिक बगुलीपर रहै छलनि। जखन एकर जानकारी सार्वजनिक भेल तँ विरोध आरम्भ भेल, से तेना जे लोक आयब कम कऽ देलनि धीरे-धीरे छोड़ि देलनि। दोसर एहि ठाम जुटऽ वला भीड़क अपन राजनीतिक उपयोग करबाक चलनसारि सेहो आघात पहुँचेलक। सभाकेँ रसातलमे पहँुचेबामे मीडियाक भूमिकाकेँ सेहो नकारल नञि जा सकैत अछि। एकरावरक बजार ने जानि की-की कहि चौल करऽ वला रिपोर्ट सभामे एनिहारकेँ रोकलक।

समाप्त नञि भेल अछि आशाक किरण

वैवाहिक सभा पञ्जी प्रथाक जीवनकेँ लऽ जतऽ निराशाक स्थिति अछि ओतहि आशाक किरण पूरा-पूरी समाप्तो नञि भेल अछि। जतऽ पञ्जीकार लोकनिमेसँ अधिकांश सभा आयब छोड़ि देलनि अछि ओतहि हरेकृष्ण झा नूनू बाबू, विश्वमोहन मिश्र, मङनू मिश्र प्रमोद मिश्र एहि परम्पराकेँ जिएने रखबा लेल भरि सभा डटल रहै छथि सिद्धान्त लिखैत रहै छथि। उल्लेखनीय अछि जे बहुत रास पञ्जीकार परिवारक नव पीढ़ीक लोक एहिसँ विरत भऽ गेला अछि। सरकारी सेवा आन-आन व्यवसायमे लागि गेला अछि। पञ्जीकारक रूपमे भेटऽ वला सम्मानमे आबि रहल कमी हुनका सभकेँ एहिसँ फराक केलकनि। पहिने गामे-गामे पञ्जीकार जाथि तँ हुनक स्वागत होइ छल। आइ एहिमे स्खलन आयल अछि। समाज पहिने जकाँ स्वागत तँ नहिञे करैत अछि, पञ्जीकारकेँ देखि सय मोन पानि पड़ि जाइ छनि। एहन विपरीत परिस्थितियोमे पञ्जीकार विश्वमोहन मिश्र अपन पुत्र विमलेन्दु शेखर मिश्र आलोकचन्द्र मिश्रकेँ एहि विद्यासँ जोड़ि कऽ रखने छथि एहिमे निपुण केने छथि। एही तरहेँ उत्तर प्रदेशक मथुरा केर मक्खन मिश्र सन लोक सेहो छथि। हुनक पूर्वज कतेको सय साल पहिने मिथिलासँ चलि गेला ओतहि बसि   गेला। मक्खन मिश्र सभ बरख सभाक समयमे आबि मिथिला भ्रमण करैत रहला अछि। एतबे नञि अपन भातिज भूपेन्द्र कुमार मिश्रकेँ सेहो एहि ठाम अनलनि जे परम्परा चलैत रहय।

संकल्प लऽ योजनाबद्ध प्रयासक जरूरति

सौराठ सभाकेँ नव जीवन देबा लेल, नव उत्साह ऊर्जासँ भरबा लेल आवश्यकता अछि जे एक-एक मिथिलावासी संकल्प लेथि तय करथि जे पहिने जकाँ बेटा-बेटीक विवाह सभेसँ करब। एहिमे युवा-शक्तिक समवेत होयब सभसँ बेसी जरूरी अछि। युवा जँ चाहथि तँ कोनो धाराकेँ अपना बलपर मोड़ि सकै छथि। आइ तँ सभा आर बेसी उपयोगी भऽ सकैत अछि जखन लोक लग समयक घोर अभाव भेल जा रहल अछि। फेरसँ पुरान स्थिति पलटाबऽ लेल योजनाबद्ध ढंगसँ प्रयासक जरूरति अछि। एहि दिस गोट-पगरा डेगो बढ़ल अछि। पछिले साल घर कथाक बाद मिहिर कुमार झा महादेव चन्दन कुमार झा केर बरियाती सौराठ सभासँ बिदा भेल छलनि। शेखरचन्द्र मिश्र आदि सभाकेँ फेरसँ प्रतिष्ठित करबाक प्रयास पछिला कतेको बरखसँ कऽ रहला अछि। हिनके सभ जकाँ समग्र मिथिलासँ समवेत प्रयास हो तँ सौराठ सभा अपन अतीतकेँ दोहरा सकैत अछि। एक बेर दरभंगामे सीतामढ़ीमे फेरसँ सभा आरम्भ करबाक बात चलल छल, मुदा कोनो ठोस परिणाम सोझाँ नञि आयल। आउ 10 जुलाइ 2013 सँ शुरू भऽ रहल सभाक अवसरपर संकल्प ली जे अपन गौरवशाली अतीतकेँ पुन: प्रतिष्ठित करब। जते गोटे सभा उसरबासँ दुखी छथि ततबे गोटे जँ एहि दिशामे सजग भऽ सक्रिय होथि तँ सौराठ सभाक दिन घूरब कोनो असम्भव नञि।



प्रस्तुति : अमलेन्दु शेखर पाठक

Saturday, July 13, 2013

मिथिला में उपेक्षित भ रहल अछि मैथीली भाषा: मीरा कुमार

समस्तीपुर: लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार आईे राष्ट्रीय साहित्य संगोष्ठीक उदधाटन समस्तीपुर में करैत कहली की मिथिलाक लोग मैथिली भाषाक उपयोग करै में आखिर किएक हिचकिचाई छथि? ओ कहलैनि जे संसद भवन में हम इंतजार करैत रहैत छी जे कोनो सांसद मैथिली भाषा में बजता. संविधानक 22 भाषा में मिथिलाक मैथिली बहुत लोकप्रीय भाषा अछि। श्रीमति कुमार कहलैनि की हम बिहार सँ छी अहि राज्य सँ आ खास कय मिथला सँ हमरा बेसी जुडाव अछि। अहि धरती पर एकसँ बढ़ी कय एक महान विभूति विद्यापति , वाचस्पति, मंडन मिश्र, कालिदास समेत अनेको विद्वान जन्म लेलैथि। मिथिलाक घरती बहुत उपजाउ अछि। आ इ धरती उर्जावान धरती सेहो अछि। मिथिला में सत्याग्रह आदोंलनसँ लय क देशक आजादी में मिथिलाक लोगक अहम भुमिका अछि। मुदा अहिक बाबजूद आई मैथिली भाषाक लेल कोनो कारगर कदम अहि क्षेत्रक जनप्रतिनिधिक द्वारा नही उठायल जा रहल  अछि जे चिंता केर विषय अछि।मातृभाषा बेसी अहि क्षेत्र में हिंदी के प्रयोग भ रहल अछि। सभा केर अध्यक्षता प्राचार्य डाक्टर मीणा प्रसाद केलैनी जहैनी की मंचक संचालन शशि केलैनी। 

Thursday, July 4, 2013

पद्मश्री महासुंदरी देवी केर निधन

मधुबनी 04 जुलाई (वार्ता) बिहारक मधुबनी पेटिंग केर देश विदेश मे लोकप्रिय बनावई वाली पद्मश्री महासुंदरी देवीक हुनक पैतृक गांव मे आई निधन भ गेलैनी . ओ 92 वर्षक छली. महासुंदरी देवीक पारिवारक सूत्र केर अनुसार ओ पिछला किछ महिना सँ बीमार चल रहल छलथि आ आई भोर साढ़े नौ बजे हुनक निधन भ गेलैनी. हुनक अंतिम संस्कार कालि कायल जायत. महासुंदरी देवी अपन अंतिम दिन मे मधुबनी जिला केर  राजनगर थाना क्षेत्र  स्थित अपन पैतृक गांव रांटी में रही रहल छलथि। हुनका पद्मश्रीक अलावा शिल्प गुरु, तुलसी सम्मान आ  राष्ट्रीय..राजकीय पुरस्कार समेत अनेको सम्मान भेटल छल। हुनका द्वारा निर्मित मिथिला पेटिंगक मांग देशक अलावा विदेश मे सेहो खूब छल। मिथिला पेटिंगक सिलसिला मे सुंदरी देवी अनेको देशक दौरा सेहो कय चुकल छलथि।

Sunday, June 30, 2013

मिथिलाक हृदय-मन्दिरमे प्रतिष्ठित मिथिला पेण्टिंग

मिथिला पेण्टिंग नाम भने आधुनिक अछि, मुदा ई परम्परा अदौसँ चलि आबि रहल अछि। सभसँ पहिने कहिया आरम्भ भेल से कहब कठिने नञि असम्भव सन अछि। जहियासँ मिथिला अछि तहिएसँ मैथिलानी एहि चित्रकलाकेँ परम्पराक रूपमे अपनासँ अगिला पीढ़ीकेँ हस्तान्तरित करैत रहली आ नव पीढ़ी एकरा अपनबैत रहल। मानल जाइत अछि जे विदेहराज जनके केर समयसँ अछि। कहल जाइत अछि जे मिथिला पुत्री भगवती सीता आ भगवान श्रीरामक विवाहक अवसरपर विदेहराज जनक नगरकेँ सजेबाक आदेश देने छला। ओहि समय जे लोक अपन घर-दुआरिकेँ सजेलक आ एहि क्रममे चत्रिकारी केलक सैह मिथिला पेण्टिंग थिक। माटिक घर-आङनमे स्थान पाबऽ वला ई मिथिला चित्र आधुनिक कालमे कागत, कपड़ापर स्थान पेलक, मुदा ओ तहिएसँ मिथिलाक हृदय-मन्दिरमे प्रतिष्ठित रहल अछि जहियासँ आरम्भ भेल।
आइ ई कला भूमि आ भित्तिसँ आगू बढ़ि कऽ कागज, कैनवस, कपड़ा, मटिक बासन आ सजावटि अन्य वस्तुकेँ सेहो अपन उपस्थितिसँ सुन्दर बनाबऽ लागल अछि। एहि चित्रकालाक अपन विशिष्टता रहल अछि। परम्परागत रूपसँ मिथिला चित्र विवाहक अवसरपर कोबरमे, उपनयनक अवसरपर मड़बा आ विशेष अवसरपर मुख्यद्वार आ गोसाउनिक घरमे बनाओल जाइत रहल। बादमे जेना-जेना एकरा अपन सुवास पसारबाक अवसर भेटल ई अन्य अवसरपर सेहो अपन उपस्थितिसँ सभकेँ आकर्षित कऽ रहल अछि। पहिने एकर विषय समेटल छल। देवी-देवता एकर आ प्रकृति एकर मुख्य विषय होइ छला। आइयो एहने सन अछि, मुदा आधुनिक कालमे एकर विषय-वस्तु बदलबाक प्रासस सेहो आरम्भ भऽ गेल अछि।

मिथिलासँ बाहरक यात्रा  

बात 1934 केर अछि जखन बिहारमे भीषण भूकम्प आएल छल। मिथिला अंचलक खण्डहरमे छिरियाएल चित्र खण्ड दिस तत्कालीन भारतीय प्रशासनिक सेवाक डब्लू.जी. आर्चरक ध्यान आकर्षित भेल। एहिसँ संबंधित एकटा लेख 1949मे अंतरराष्ट्रिय कला पत्रिकामे प्रकाशित भेल।
प्रबुद्ध कलाकार जगत एहि दिस आकृष्ट भेला, मुदा राष्ट्रिय आ अन्तरराष्ट्रिय स्तरपर मिथिला चित्रकलाक प्रतिष्ठा तखन भेल जखन 1966-68मे अकाल पीड़ित नगरवासीक आजीविकाक रूपमे एहि कलाकेँ सरकारी आ गैरसरकारी संस्थानक संरक्षण आ मार्गदर्शन भेटल। लगभग 1970 मे अमेरिकी मानवशस्त्री रेमण्ड आ जर्मनीक इरेका मोसर एहि चित्रकला सौन्दर्यकेँ परखलनि। कलाक विस्तार भेल आ आइ ई जापानमे चमकि रहल अछि। एकर परिष्कृत, परिमार्जित आ वैविध्यपूर्ण रूप सोझाँ आयल। एतबे निञ उपेक्षित वर्गक कला बेसी प्रचलित भेल। विषयान्तर सेहो भेल आ दैवीय आकारक स्थान दैनादिन जीवन लऽ लेलक। विकास पुरुषक नामे ख्यात ललित नारायण मिश्रक अवदान सेहो एहि चित्रकलाकेँ राष्ट्रिय स्तरपर ख्यात करबामे रहलनि।
कलाकार जमुना देवीक एकटा चित्रमे एकटा दलितकेँ मरल गायकेँ कात लगबैत देखाओल गेल छल, ओ बहुत सम्मानित भेल छल। एहि जाति विशेषक कलाकेँ राष्ट्रिय मान्यता तखन भेटल जखन 1970 मे जितवारपुरक जगदम्बा देवीकेँ हुनक चित्रकलाक लेल राष्ट्रपति द्वारा 1970 मे सम्मानित कयल गेलनि।
मिथिलाक ओ वर्ग जे सामान्य समाजसँ कात छल सेहो आइ एहिसँ जुड़ल आ सम्मानित जीवन बिता रहल अछि। मिथिला पेण्टिंग लेल बुआ देवी, सीता देवी, शान्ति देवी आ महासुन्दरी इत्यादिकेँ राष्ट्रिय आ अन्तरराष्ट्रिय प्रतिष्ठा प्राप्त भेलनि। जितवारपुरक लोककलाक लेल महासुन्दरी देवीकेँ पद्मश्रीसँ सम्मानित कयल गेलनि। आइ बहुत रास कलाकार छथि जे देश-विदेशमे अपन कलाक प्रदर्शन कऽ रहल छथि आ एहिसँ हुनका आर्थिक लाभ  सेहो भऽ रहलनि अछि।

मिथिला पेण्टिंग की मधुबनी पेण्टिंग 

मिथिला पेण्टिंगकेँ बहुत रास लोक मधुबनी पेण्टिंग केर नामसँ सेहो अभिहीत करै छथि। ई सत्य जे एकर प्रचार-प्रसार तखने भेल जखन ई सर्वप्रथम मधुबनीमे देखल जेबाक बाद राष्ट्रिय स्तरपर प्रतिष्ठित कयल गेल। आइयो सर्वाधिक अवदान मधुबनीक अछि। तकर कारण ईहो अछि जे सरकारी स्तरपर अथवा गैर सरकारी स्तरोपर जखन कखनो मिथिला पेण्टिंग केर प्रसंग कोनो योजना बनैत अछि अथवा एकरा आगाँ बढ़ेबाक बात उठैत अछि, किंवा आने कोनो तथ्य सोझाँ अबैत अछि सभ मधुबनीपर केन्द्रित होइत रहल अछि, मुदा एहि सत्यपर ध्यान देल जेबाक आवश्यकता  अछि जे ई चित्रकला सगरो मिथिलामे पल्लवित-पुष्पित होइत रहल अछि। चाहे ओ मिथिलाक दरभंगा हो, समस्तीपुर, बेगूसराय, सहरसा, सुपौल, मधेपुरा, पूर्णिया, भागलपुर, बेतिया आदि कोनो क्षेत्र हो सभ तरि कोनो ने कोनो रूपमे ई आइयो विद्यमान अछि। नञि किछु तँ विवाहक अवसरपर कोबर लिखबामे तँ अवश्ये। तेँ एकरा मिथिला पेण्टिंग कहब बेसी श्रेयष्कर अछि। ई नाम एकरा क्षेत्रक विस्तार दैत अछि आ मिथिलाक सांस्कृतिक विरासति हेबाकेँ सेहो पुष्ट करैत अछि। मिथिलाकेँ छोट करबाक षड्यंत्र सभ दिनसँ होइत रहल अछि आ ताहि दिशामे कोनो एक जिला मात्रसँ एहि ऐतिहासिक आ सांस्कृतिक कलाकेँ खुटेसि देब सहयोगे कहल जायत।

पर्यावरणक हितैषी 

मिथिला पेण्टिंग पर्यावरणक बड़ पैघ हितैषी रहल अछि। एहिमे देवी-देवताक अतिरिक्त बाँस, काछु, माछ, सर्प आदि केर चित्रण होइत अछि जे पर्यावरणक अभिन्न अंग रहल अछि। एहि सभक अपन फराक-फराक महत्वो अछि, जेना बाँसकेँ वंश-वृद्धिक प्रतीक मानल जाइत अछि। एहिमे प्रकृतिएसँ रंगक व्यवस्था कयल जाइत रहल अछि। पहिने घास, पात, गोबर आदिसँ रंग तैयार कयल जाइ छल। एमहर आबि कऽ आधुनिक रंगक प्रयोग सेहो आरम्भ भऽ गेल अछि। आधुनिकता एकरा विस्तार देलक अछि अवश्य, मुदा ई अपन मूल प्रकृतिसँ फराक सेहो भेल जा रहल अछि जाहिपर नियंत्रण नञि भेलल तँ धीरे-धीरे ई अपन मूलसँ  पूरापूरी फराक भऽ जायत।

बिचबैयाक चाङुरमे कला आ कलाकार 

मिथिला चित्रकला अर्थात मिथिला पेण्टिंग केर विकास भऽ रहल अछि, बहुत रास कलाकार एहिसँ सभ दृष्टिञे लाभान्वित भऽ रहल छथि, मुदा बहुत रास कलाकार एखनो अपन कलाक उचित मूल्य नञि पाबि रहल छथि। कला आ कलाकार बिचबैयाक चाङुरमे छथि। बहुत रास कलाकार केर कहब छनि जे बिचबैया हुनकासँ उधारी पेण्टिंग लऽ जाइत अछि आ पेमेण्टमे बरखो लगा दैत अछि। बजारक अभावक कारण कालाकार चाहियो कऽ बिचबैयासँ मुक्त नञि भऽ पबै छथि। सराकर दिससँ जे आर्थिक सहयोगक प्रावधान होइत अछि ओहूपर बिचबैयेक नियंत्रण रहै छनि। ओ जकरा चाहै छथि तकरा प्रशिक्षण किंवा प्रदर्शनीमे लऽ जाइ छथि। कहल जाइत अछि जे कलाकारसँ जे चित्र सय-दू सयमे कीनल जाइत अछि ओकरा बाहरमे हजारोमे बेचल जातइ अछि। परिणाम अछि जे कलाकारक समक्ष रोटी-नोनक समस्या रहिए जाइ छनि। किछु अपवादकेँ छोड़ि अधिकांश संस्था अपन कालाकारक शोषण करैत अछि। ओतहि मिथिला पेण्टिंग केर प्रशिक्षणकेँ आजीविकाक साधन बना बहुत गोटे अपन दू कौर केर जोगाड़ सेहो कऽ लै छथि। ओतहि साड़ी, चद्दरि, गेरुआक खोल, रुमाल, पाग, गमछा, सोफा आदिपर मिथिला पेण्टिंगकेँ पहँुचा कऽ सेहो बहुत गोटेक चूल्हि पजरि रहलनि अछि, मुदा आवश्यकता अछि कलाकारक लगपासमे एहन बजारक जे हुनका शोषणसँ बचाबय आ आर्थिक सम्पन्नताक माध्यम बनय।